गणित शिक्षण की आवश्यकता किन कारणों से हुई ? अथवा, दैनिक जीवन में गणित की आवश्यकता का वर्णन कीजिए।

 प्रश्न 1. गणित शिक्षण की आवश्यकता किन कारणों से हुई ? अथवा, दैनिक जीवन में गणित की आवश्यकता का वर्णन कीजिए।



    उत्तर _  गणित का महत्त्व शिक्षा के क्षेत्र में गणित का अत्यधिक महत्व है। गणित का हमारे दैनिक जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। आधुनिक युग में सभ्यता का आधार गणित ही है। मातृभाषा के अतिरिक्त ऐसा कोई विषय नहीं है जो दैनिक जीवन से इतना अधिक सम्बन्धित हो गणित को व्यापार का प्राण तथा विज्ञान का जन्मदाता माना जाता है। वर्तमान समय में गणित को विद्यालयी पाठ्यक्रम में विशेष स्थान दिया गया है। इसका प्रमुख कारण है कि गणित बालक को अपनी जीविका कमाने के योग्य बनाने के साथ ही उसके ज्ञान में वृद्धि करता है और जीवन के विभिन्न कार्यों को सीखने एवं करने में सहायता प्रदान करता है। विद्यार्थियों का मानसिक विकास करके उनकी बुद्धि को प्रखर बनाता है तब विभिन्न चारित्रिक गुण विकसित कर चरित्र निर्माण में सहायता करता है।

    गणित शिक्षण के मुख्य मूल्यों को विस्तृत रूप में निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है। 

    1. बौद्धिक मूल्य (Intellectual Value)–बौद्धिक विकास के लिए गणितीय शिक्षण का अत्यधिक महत्व है। पाठ्यक्रम का अन्य कोई विषय ऐसा नहीं है जो गणित की तरह छात्र के मस्तिष्क को क्रियाशील बनाता हो। गणित की प्रत्येक समस्या को हल करने के लिए मानसिक कार्य की आवश्यकता होती है। जैसे ही गणित की कोई समस्या बच्चे के समक्ष आती है उसका मस्तिष्क उस समस्या को समझने तथा उसका समाधान करने के लिए क्रियाशील हो जाता है। गणित की प्रत्येक समस्या एक ऐसे क्रम से गुजरती है जो कि एक रचनात्मक एवं सृजनात्मक प्रक्रिया के लिए आवश्यक है। इस प्रकार बच्चे की सम्पूर्ण मानसिक शक्तियों का विकास गणित पढ़ने से सरलता से हो जाता है। किसी भी समस्या का उचित हल ज्ञात करने की क्षमता का विकास गणित के अध्ययन से ही संभव है।

    2. व्यावहारिक मूल्य (Practical Value) गणित शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य उसकी व्यावहारिक उपयोगिता है। यह उद्देश्य कोई नया उद्देश्य नहीं है वरन् यह प्राचीन काल से ही प्रचलित है। गणित के अन्य उद्देश्यों में सर्वप्रथम इसी उद्देश्य का जन्म हुआ। गणित के बड़े आलोचक भी इस बात से इन्कार नहीं नहीं कर सकते कि केवल प्रयोगात्मक मूल्य को सामने रखते हुये इसका अध्ययन अध्यापन परमावश्यक है। प्रत्येक मनुष्य को व्यावहारिक एवं सामाजिक जीवन में प्रतिदिन विभिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं को हल करने के लिए उसे किसी न किसी रूप में गणित का उपयोग अवश्य ही करना पड़ता है। एक व्यक्ति अपना कार्य बिना पढ़े-लिखे चला सकता है, लेकिन बिना गणना या गिनती का ज्ञान रखे वह अपना काम नहीं चला सकता। इसके अभाव में इसे दूसरों की कृपा दृष्टि पर ही निर्भर रहना पड़ेगा और जीवन में पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। आज हम माप तौल की दुनिया में रह रहे हैं जहाँ दिनों-दिन मापक दण्ड का मूल्य बढ़ रहा है। आज संसार प्रत्येक वस्तु की उन्नति को चाहे वह भौतिक, सामाजिक, आत्मिक हो अथवा मासिक, उसे मापना चाहता है। घर का बजट बनाते समय, आय और मजदूरी निकालते समय, वस्तुओं को तौलते समय, घड़ी में समय देखते हुये, गाड़ी चढ़ते समय, दफ्तर अथवा स्कूल जाते समय, लिफाफे पर टिकट लगाते समय, तारघर में तार देते समय, दूध उबालते समय, थर्मामीटर लगाते समय, दौड़ करवाते समय, परीक्षाओं में परचें बाँटते समय, समय का मुख्य ध्यान रखने की बहुत आवश्यकता प्रतीत होती है। जीवन का कोई पक्ष ऐसा नहीं, जिसमें गणित की आवश्यकता नहीं। वेतन का बिल बनाते समय, मकान बनाते समय, नाप-तौल आदि के पूर्ण ज्ञान की आवश्यकता होती है। बेचारे कुली से लेकर, जो मुश्किल से अपनी जीविका कमा पाता है, फाइनेंस मिनिस्टर तक जिनका लाखों और करोड़ों रुपये का बजट बनता है, पान वाले से लेकर जो कि सिर्फ रुपये और पैसे तक हिसाब रखता है, बिरला और टाटा तक जो करोड़ों रुपयों का व्यवसाय करते हैं, साधारण बढ़ई से लेकर, बड़े-बड़े इंजीनियरों तक जो संसद जैसे विशाल भवन का निर्माण करते हैं, सभी को अपनी-अपनी आवश्यकतानुसार गणित के ज्ञान की आवश्यकता होती है। इस सम्बन्ध में यंग महोदय का कथन सत्य ही प्रतीत होता है-“लौह, वाष्प और विद्युत के इस युग में जिस ओर भी मुड़कर देखें, गणित की सर्वोपरि है। यदि यह रीढ़ की हड्डी निकाल दी जाये तो हमारी भौतिक सभ्यता का ही अन्त हो जायेगा।"

    गणित की मूलभूत प्रक्रिया जैसे गिनना, जोड़ना, भाग देना, घटाना, तौलना, मापना, बेचना, खरीदना, गुणा आदि हमारे दैनिक जीवन का, यहाँ तक की सभी व्यवसाय, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, गणित पर ही टिका हुआ है ।

    3. सांस्कृतिक मूल्य (Cultural Value) –समाज की संस्कृति और सभ्यता के निर्माण एवं विकास में गणित ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। गणित के अध्ययन से व्यक्ति को समानता, समरूपता, क्रमबद्धता, नियमितता आदि महत्वपूर्ण सामाजिक मूल्यों का बोध होता है जिनके द्वारा वह प्रकृति में पाये जाने वाले सौन्दर्य की अनुभूति कर सकता है। नृत्य, चित्रकला, हस्तकला आदि का विकास गणित के ज्ञान द्वारा ही संभव हुआ है । मनुष्य में सौंदर्य के प्रति आकर्षण बहुत अंशों तक गणित के ज्ञान पर निर्भर करता है। किसी समाज या देश की संस्कृति से हमारा अर्थ उसकी उन सब वस्तुओं से होता है जो हमें अपने पूर्वजों से धरोहर के रूप में मिलती हैं। इसमें कला, संगीत, साहित्य, विज्ञान तथा सामाजिक मान्यताएँ सभी कुछ आ जाते हैं। प्रत्येक पीढ़ी अपने पूर्वजों से जो ज्ञान प्राप्त करती है। उसे वह अगली पीढ़ी के लिए अपने योगदान के पश्चात् छोड़ जाती है।

    गणित के अध्ययन से मनुष्य सभ्य बन चुका है। ज्यों-ज्यों सामाजिक जीवन अधिक जटिल बनता जाता है, त्यों-त्यों गणित के अध्ययन की आवश्यकता बढ़ती जाती है। गणित का सांस्कृतिक महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। मानव अधिक सुसभ्य तथा समृद्ध होने का एकमात्र कारण गणित में नवीनतम खोजें एवं प्रयासों को ही माना जा सकता है। आज हम आधुनिक कहलाने में गर्व का अनुभव करते हैं और इसी आधुनिक सभ्यता की नींव जिन व्यवसायों पर टिकी हैं वे हैं एग्रीकल्चर, इंजीनियरिंग, मेडिसिन, इन्डस्ट्री आदि । लेकिन, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिन व्यवसायों को हम आधुनिक सभ्यता की रीढ़ की हड्डी समझते हैं उनके विकास में गणित ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

    4. अनुशासनात्मक मूल्य (Disciplinary Value) यह उद्देश्य गणित के अनुशासनात्मक मूल्यों की प्राप्ति के लिए है। इसके अन्तर्गत हम मनोविज्ञान के शिक्षा का स्थानान्तरण के सिद्धान्त का उपयोग करते हैं। विद्यालयों में गणित इसलिए पढ़ायी जातीहै कि छात्रों को विभिन्न मानसिक शक्तियों, जैसे-नियमितता, परिशुद्धता, मौलिकता, आत्मनिर्भरता, क्रमबद्धता, सभ्यता और ईमानदारी, एकाग्रता, कल्पना, आत्म-विश्वास, शीघ्र समझने की शक्ति, स्मृति आदि का प्रशिक्षण मिल सके जिससे उनका मस्तिष्क अनुशासित हो जाये। छात्रों को विभिन्न मानसिक क्रियाओं का प्रशिक्षण मिलता है अतः वे अन्ध विश्वासों के आधार पर देखकर, सुनकर अथवा पढ़कर किसी बात को सही नहीं मान लेते हैं अपितु 1 स्वयं परीक्षण करके अपने निरीक्षण के आधार पर ही निष्कर्ष निकालते हैं।

    इस उद्देश्य के अनुसार गणित मानसिक व्यायाम के लिए है और इस उद्देश्य की पूर्ति तभी संभव है जबकि बालक पढ़ते समय और अध्यापक उन्हें पढ़ाते समय इस बात की विशेष चिन्ता न करें कि उन्होंने क्या पढ़ा है? अथवा कितना पढ़ा है ? बल्कि अपना सारा ध्यान इस बात पर केन्द्रित करें कि उन्होंने उसे 'किस प्रकार' और 'किस विधि द्वारा' पढ़ाया। है। नये ज्ञान की प्राप्ति केवल विचार, तर्क, निर्णय आदि मानसिक क्रियाओं द्वारा ही होनी चाहिए। गणित के अध्ययन में स्मरण शक्ति का कम प्रयोग होता है। विवेक शक्ति बहुत प्रखर हो जाती है। गणित का विद्यार्थी यह अनुभव करने लगता है कि समस्याओं को हल करने में स्मरण शक्ति की अपेक्षा चिन्तन और तर्क का अधिक प्रयोग किया जाता है। गणित पढ़ा हुआ विद्यार्थी अन्य विद्यार्थियों की अपेक्षा तर्क के द्वारा शीघ्र ही निर्णय करके दैनिक जीवन सम्बन्धी समस्याओं को बड़ी सुविधा से हल कर लेता है। गणित का एक अच्छा विद्यार्थी कपट, झूठ, धोखा एवं आडम्बर को पसन्द नहीं करता। चरित्र निर्माण एवं मानसिक अनुशासन के लिए गणित एक सर्वश्रेष्ठ विषय है। गणित एवं दर्शन-शास्त्र का घनिष्ठ सम्बन्ध है। संसार के प्रसिद्ध गणितज्ञ दर्शन-शास्त्री भी हुये हैं। बर्ट्रेण्ड रसेल, आइन्सटीन आदि गणितज्ञ इसके उदाहरण हैं। इस विषय के अध्ययन से सूक्ष्म निरीक्षण की आदत का विकास होता है तथा यही आदत व्यक्ति को संसार के अनेक गूढ़ तत्वों के बारे में चिन्तन की ओर अग्रसर करती है

    इस प्रकार गणित शिक्षण अत्यन्त ही आवश्यक है, प्राथमिक स्तर से ही बालक गणितीय चिन्तन की ओर बढ़ता है, बालक अपने अनुभवों व त्रुटियों के साथ काम करना प्रारंभ करता है व धीरे-धीरे विद्यालयी शिक्षा का यह ज्ञान एक विषयात्मक उपागम की ओर बढ़ता है। अतः गणित का अध्ययन प्रत्येक व्यक्ति को इस योग्य बनाता है कि उसकी चिन्तन प्रक्रिया क्रमबद्ध, तर्कसामान्य एवं व्यावहारिक हो तथा दैनिक जीवन में गणितीय संक्रियाओं का प्रयोग कर सके ।।

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