प्रश्न . लेखन के विभिन्न साधन सुलेख, अनुलेख एवं श्रुतिलेख का वर्णन कीजिए ।
प्रतिलेख को भी एक प्रकार से हम सुलेख कह सकते हैं क्योंकि अनुलेख की यह दूसरी प्रकार की विधा है।
पुस्तक को देखकर अपनी अभ्यास पुस्तिका में लिखना, लिखने की प्रारंभिक क्रियाएँ सिखाने का अच्छा साधन है। विराम चिह्न लगाने, अनुच्छेद बनाने आदि का भी अभ्यास इसी में हो जाना चाहिए। लिखते समय शिक्षक को चाहिए कि बालकों को आवश्यक सहायता दे। एक-एक अक्षर को देखकर नहीं लिखने देना चाहिए। अच्छा यह हो कि एक सार्थक शब्द-समूह बालक एक बार ही देखकर लिख लें। जब तक हिन्दी लिखने की योग्यता आवश्यक मानदण्ड तक नहीं आ जाती तब तक यह वांछनीय है कि अनुलेख कक्षा पात तक चलता रहे। कुछ परिवर्तित रूप में अनुलेख रचना का बड़ा अच्छा अभ्यास बन जाता है। एक व्यक्ति के कथन को दूसरे के शब्दों में लिखना, दूसरे काल में लिखना, निर्दिष्ट स्थानों पर विशेषण अथवा क्रिया विशेषण लगाना, कुछ शब्दों के स्थान पर एक शब्द रखते हुए अनुलेख लिखना आदि परिवर्तित अनुलेख के कुछ रूप है। जो भाग अनुलेख अथवा श्रुतलेख के लिए चुना जाए, वह भाषा और भाव दोनों की दृष्टि से उपयुक्त कठिनाई का होना चाहिए।
श्रुतलेख – श्रुतलेख सुना हुआ लेख है। अनुलेख में सामने नमूने के रूप में मुद्रित अक्षर होते हैं, श्रुतलेख में इस नमूने का अभाव रहता है। इसमें अध्यापक बोलता जाता है और छात्र सुनकर बोली हुई सामग्री लिखता जाता है। श्रुतलेख में सुन्दर लिखावट का सर्वाधिक महत्त्व नहीं है। इसमें महत्त्व भाषा की शुद्धता का हो जाता है।
सुनकर समझने की योग्यता के शिक्षण और परीक्षण का श्रुतलेख अच्छा साधन है। वर्तनी को पढ़ाने के लिए इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। श्रुतलेख के लिए ऐसा कठिन अंश चुनने से लाभ की अपेक्षा हानि ही होती है, जिसमें अनेक अपरिचित और कठिन शब्द हो। इससे अशुद्ध लिखने का अभ्यास पड़ जाता है। यदि श्रुतलेख के लिए अच्छे गांश चुने जाएँ, तो भाषा प्रयोग सीखने का अभ्यास होता चलता है। ध्यान एकाग्र करने के लिए आवश्यक है कि लिखते समय एक बार से अधिक कोई अंश न बोला जाय। जब तक बालक अनुलेख ठीक-ठीक न लिख सकें, तब तक श्रुतलेख न करना चाहिए। अनुलेख से श्रुतलेख तक लाने के लिए बालकों को गद्यांश पहले पढ़ने को दिया जा सकता है। इसके पश्चात् केवल कठिन शब्द श्यामपट पर लिखकर बता दिए जाएँ, प्रारम्भ में कई बार पढ़कर सुना दिया जाए, आवश्यकतानुसार अर्थ समझा दिया जाए इत्यादि, परन्तु लिखते समय बालकों को कवेल अपने ही पैरों पर खड़े रहना चाहिए।
अन्तिम बार पढ़ने के पहले और पीछे दोनों समय बालकों को अपनी भूल सुधार अपने आप का अवसरदेना चाहिए। अपनी अशुद्धि अपने आप सुधारना सर्वोत्तम है। पहले पढ़ना, दूसरी बात धीरे-धीरे पढ़ना और अन्तिम बार फिर पढ़कर सुनाना आवश्यक है। जो शब्द साथ-साथ बोले जाएँ वे सार्थक तथा सहचर होने चाहिए।
श्रुतलेख का उद्देश्य छात्रों की श्रवणेन्द्रियाँ प्रशिक्षित करना है ताकि वह भाषा के शुद्ध रूप को सावधानी से सुन सके। बच्चे की लिखावट में सुडौलता के साथ-साथ स्पष्टता का अभ्यास कराना, लिखावट में गति लाना, एकाग्रचितता लाना श्रुतलेख का लक्ष्य है। इसके द्वारा बच्चे के हाथ, कान, मस्तिष्क की क्रियाओं में संतुलन स्थापित किया जाता है, उसकी स्मरण शक्ति का विकास किया जाता है और सुनकर भाव ग्रहण करने का भी कुछ अभ्यास कराया जाता है। वर्तनी की शिक्षा भी इसका एक अन्य उद्देश्य है और इसका एक अन्य उद्देश्य लिखावट में शीघ्रता, सुडौलता, एकाग्रचितता, शुद्धता का मूल्यांकन करना भी है। श्रुतलेख की शिक्षा के लिए अध्यापक को गद्यांश या पद्यांश चुनते समय इस बात का ध्यान रखवना चाहिए कि व न तो बहुत अधिक कठिन हो और न ही बहुत अधिक सरल । उस अंश को पहले अध्यापक द्वारा धीरे-धीरे पूरा पढ़ा जाय। पढ़ने में विराम आदि का ध्यान रखते हुए उचित आरोह अवरोह का भी ध्यान रखे। तत्पश्चात् एक या दो शब्द धीरे-धीरे बोलें और छात्रों से लिखने को कहें। सम्पूर्ण अंश लिखा देने के बाद एक बार फिर अध्यापक उस अंश का वाचन करें, ताकि यदि कुछ छूट गया हो तो छात्र लिख लें। इसके बाद छात्रों की कापियों का सावधानी से संशोधन हो संशोधन अध्यापक स्वयं कर सकता है। वह छात्रों को आपस में कापियाँ बदलकर संशोधन करने को कह सकता है। यदि छात्र संशोधन कर रहा हो तो लपेट-श्यामपट पर लिखा हुआ पूरा अंश कक्षा में टाँग देना चाहिए, जिससे छात्र उसे देखकर संशोधन कर सके। छात्रों द्वारा संशोधन करने पर भी बाद में अध्यापक उन कापियों को स्वयं देखें। इसके बाद अशुद्ध शब्दों को छात्र शुद्ध रूप में चार-पाँच बार लिखाकर उनका अभ्यास करा लें।


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