प्रश्न 1. 'स्कीमा' क्या है ? जीन पियाजे के सिद्धान्त के आलोक में सीखने में आत्मसात करने और समायोजन की भूमिका की पड़ताल करें।
उत्तर—जीन पियाजे एक जीव वैज्ञानिक की तरह भाषा सीखने को व्याख्यायित करते हैं। उनका मानना है कि मानसिक विकास में जन्मजात कारकों की भूमिका नहीं होती, विकास का कारण है—जीव और वातावरण के बीच अन्तःक्रिया । इसका एक निहितार्थ यह है कि जिस प्रकार बच्चा/बच्ची वातावरण के संपर्क में आता है और उसका विकास क्रमशः होता है, उसी प्रकार उसकी भाषा का भी विकास होता जाता है। जैसे-जैसे बच्चा वातावरण के संपर्क मे आता है अथवा वातावरण से अंतःक्रिया करता है, वैसे-वैसे उसकी मानसिक , संरचनाओं में गुणात्मक बदलाव आता है। पियाजे के अनुसार सीखने के संदर्भ में1 आत्मसातीकरण और समायोजन की प्रक्रिया महत्त्वपूर्ण होती है। एक उदाहरण के माध्यम से इसे समझने का प्रयास करते हैं। एक बच्चा अपनी माँ के साथ बाजार जाता है। वह एक गाय देखता है और उसकी माँ उस गाय की ओर संकेत कर कहती है—देखो गाय आ गई । बच्चा गाय की 'छवि को उसके नाम के साथ ध्वनि/आवाज संयोजित कर लेता है। यानी बच्चे की बौद्धिक संरचना में 'गाय' की छवि और ध्वनि अपना स्थान ले लेती है । पियाजे के अनुसार यह छवि 'स्कीमा' कहलाती है। बच्चा अपनी बौद्धिक संरचना के आधार पर उसे आत्मसात करता है। अब बच्चा कुत्ता, बैल, बिल्ली आदि देखता है और उसे 'गाय' कहकर संबोधित करता है । यह सामान्यीकरण की प्रवृत्ति है। बच्चे के गाय और शेष जानवरों में संभवतः पैरों के आधार पर सामान्यीकरण किया। लेकिन जब अलग-अलग समय पर बच्चे के समक्ष उन जानवरों को अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है तो बच्चा पूर्व में बनाई गई छवि में परिवर्तन करता है। इस परिवर्तन के आधार पर वह गाय, कुत्ता, बैल, बिल्ली आदि जानवरों में भेद करना सीखता है और उसके साथ क्रमशः उनके नामों (ध्वनियों/शब्दों) को जोड़ता है। इतना ही नहीं वह धीरे-धीरे समय के बढ़ते क्रम में अलग-अलग तरह की गायों (सफेद, काली, भूरी, चितकबरी आदि) में भी अंतर करने लगता है और उसी के अनुरूप शब्दों का प्रयोग करता है। यह समयोजन की स्थिति है।
प्रश्न 2. हिन्दी शिक्षण में मूल्यांकन की उपयोगिता को बताएँ ।
उत्तर- हिन्दी शिक्षण में मूल्यांकन की उपयोगिता - हिन्दी भाषा के शिक्षण में भी हमें मूल्यांकन का वह उपयोग दृष्टिगोचर होता है, जो अन्य विषयों में है। जब हमें भाषा को पढ़ाने के उद्देश्यों को निर्धारित करना बहुत ही आवश्यक हो जाता है। शायद हम बहुत कम इस पर विचार करते हैं कि हमारे भाषा पढ़ाने के क्या उद्देश्य हैं— क्या-क्या अथवा कौन-कौन-सी क्षमताएँ हम बालकों को देना चाहते हैं, जिनके प्राप्त कर लेने पर हम उनकी जाँच कर सकें और यह कह सकें कि बालकों को भाषा ज्ञान हो गया है और उन्होंने भाषा सीख ली है। उदाहरण के लिए हम कह सकते हैं कि बालक की भाषा के माध्यम से अपने विचारों, इच्छाओं व मनोवृत्तियों को अभिव्यक्त करने की क्षमता प्राप्त हो जाये। यह ठीक है और सब स्वीकार करते हैं कि भाषा-शिक्षण का यही उद्देश्य है, परन्तु इसका क्या तात्पर्य है, इस पर हम पर्याप्त विचार नहीं करते। हम कब कह सकते हैं कि बालक को यह क्षमता प्राप्त हो गई। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम अपने प्रत्येक उद्देश्य को बालक के व्यवहार परिवर्तनों में स्पष्ट करें और यह देखें कि बालक क्या-क्या कर सकता है ? तब हम कह सकते हैं कि बालक को वह क्षमता प्राप्त हो गई। यदि उपर्युक्त उद्देश्यों को लेकर ही हम चलें और यह निश्चित कर लें कि बालक शुद्ध बोलता है, उसका उच्चारण शुद्ध है तो वह अपने स्वर को यथोचित उतार-चढ़ाव दे सकता है। वह शब्दों का प्रयोग ठीक करता है आदि, तो हम कह सकते हैं कि उक्त उद्देश्यों की पूर्ति हो गई। इसी प्रकार भाषा के प्रत्येक उद्देश्यों को व्यवहार-परिवर्तन के रूप में समझने की आवश्यकता है, तभी हम अपने उद्देश्यों के सम्बन्ध में निश्चित हो सकते हैं।
प्रश्न 3. हिन्दी शिक्षण में मूल्यांकन के में ध्यान देने योग्य बातों को बताएँ ।
उत्तर- हिन्दी शिक्षण में मूल्यांकन के क्षेत्र में निम्नलिखित बातें ध्यान देने योग्य हैं।
(i) मूल्यांकन व्यापक होना चाहिए, जिसमें भाषा के सभी पक्षों एवं योग्यताओं की जाँच की जाए।
(ii) सैद्धान्तिक विषयों के साथ-साथ विविध अभ्यासात्मक कार्यों तथा व्यावहारिक क्रियाओं का भी मूल्यांकन किया जाये। जैसे—पत्र-पत्रिकाएँ और अतिरिक्त पुस्तकें पढ़ना, पढ़ी हुई विषय-सामग्री पर कक्षा में चर्चा करना, कहानियों एवं कविताओं का संकलन करना, भाषा शिक्षण विषयक श्रव्य-दृश्य उपकरणों का निर्माण करना आदि ।
(iii) मूल्यांकन में मौखिक परीक्षा को भी अनिवार्य रूप से स्थान दिया जाये। मौखिक परीक्षा में सर्वाधिक बल भाषा की शुद्धता और शब्दों के सही प्रयोग पर होना चाहिए ।
(iv) मूल्यांकन सतत् होना चाहिए। प्रत्येक पाठ को पढ़ाने के पश्चात् उसका मूल्यांकन किया जाये सम्प्राप्ति मूल्यांकन के निष्कर्षों के आधार पर निदानात्मक परीक्षण किया जाये और उपचारात्मक अभ्यास करवाया जाये ।
(v) भाषिक ज्ञान समुन्नयन और शिक्षण पद्धति के लिए आन्तरिक और बाह्य मूल्यांकन दोनों को यथोचित स्थान दिया जाये। सत्रीय कार्य का मूल्यांकन वर्षभर समान रूप से होना चाहिए ।
प्रश्न 4. हिन्दी भाषा शिक्षण में शिक्षकों की मूल्यांकन सम्बन्धी क्या जिम्मेवारी हैं ?
उत्तर- हिन्दी भाषा शिक्षण में पाठ्यक्रम के साथ-साथ ही शैक्षणिक उद्देश्यों को भी उचित महत्त्व दिया दिया जा सके, इसके लिए आवश्यक है कि अध्यापक हिन्दी शिक्षण के विविध उद्देश्यों व उनकी महत्ता को भली प्रकार समझे। वह इन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर पाठ्य-वस्तु को उचित इकाइयों में विभाजित करे। वह पाठ्य-वस्तु की विभिन्न इकाइयों का अध्यापन तत्सम्बन्धी उद्देश्यों को ध्यान में रखकर करे । अध्यापन करते समय उन उद्देश्यों पर बन सकने वाले प्रश्नों के प्रति वह सदैव सजग रहे, जिन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किसी विशिष्ट पाठ्य इकाई का अध्ययन किया जा रहा हो। यदि अध्यापक इतना व्युत्पन्नमति हो कि अध्यापन कार्य करते समय उत्पन्न स्थिति का उपयोग अच्छे प्रश्न बनाने में कर सके, तो अत्यन्त उच्चकोटि के प्रश्नों का निर्माण हो सकता है। एक या दो इकाइयों के अध्यापन के पश्चात् वह नयी पद्धति के अनुसार परीक्षा करे। वह विद्यार्थी की उत्तर-पुस्तिकाओं का सूक्ष्म विश्लेषण करें। इससे यह ज्ञात हो सकेगा कि अपेक्षित उद्देश्यों की प्राप्ति किस सीमा तक हुई है ? आवश्यकता होने पर अध्यापक कुछ अंशों को पुनः पढ़ाए


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