प्रश्न . शिक्षक के रूप में स्वयं को तैयार करने में शिक्षक शिक्षा कार्यक्रमों की भूमिका पर प्रकाश डालें।

उत्तर—शिक्षकों के वृत्तिक विकास में शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम की काफी अहम भूमिका है। क्योंकि इन शिक्षक शिक्षा कार्यक्रमों के माध्यम से नवीन सूचनाओं की संप्राप्ति, अभिवृत्ति में बदलाव, शिक्षण कौशलों का विकास शिक्षकों में हो पाता है। वास्तव में, किसी भी क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करने में प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि बिना प्रशिक्षण के निश्चित समय में सही तरीके से लक्ष्य की प्राप्ति संभव नहीं हो पाती। शिक्षा के क्षेत्र में नित्य नए बदलाव हो रहे हैं। विभिन्न आयोगों की सिफारिशों एवं अनुशंसाओं के परिणाम स्वरूप शिक्षा का अधिकार अधिनियम के बाद सतत् व्यापाक मूल्यांकन (CCE-Continuous and Comprehensive Evaluation) भी अनिवार्य हो गया है। इन सभी परिवर्तनों से अवगत होने के लिए प्रशिक्षण की महत्ता स्वयंसिद्ध है। प्रशिक्षण में कई लोग मिलकर शैक्षिक समस्याओं के समाधान का प्रयास कर हल खोजने का प्रयत्न करते हैं। साथ ही, शिक्षा के क्षेत्र के सभी बदलावों से अवगत होते हुए तद्नुरूप स्वयं में आवश्यक दक्षता संवर्द्धन एवं विकास का भी कार्य करते हैं। प्रशिक्षण के माध्यम से उनमें अपने कार्य संचालन की एक विशेष दृष्टि उत्पन्न होती है जिससे विद्यालय एवं प्रशिक्षुओं को काफी लाभ होता है।
प्रशिक्षण के माध्यम से शिक्षकों में योग्यता, क्षमता और प्रतिबद्धता को विकसित करने का प्रयास किया जाता है। योग्यता, क्षमता और कुशलता आत्मविश्वास को जन्म देती है जो शिक्षण व्यवसाय और सम्बन्धित आचारसंहिता के प्रति प्रतिबद्धता उत्पन्न कर सकता है। शिक्षकों में शैक्षिक बुद्धिमता के विकास के लिए स्वतंत्र रूप से पढ़ने का कौशल, परस्पर सम्बन्ध स्थापना का कौशल (Interpersonal Relationship), मानवीय सम्बन्धों के विकास का कौशल, चिंतन मनन कौशल, प्रयोग करने एवं नित्यनए विषयों (नवाचार) को प्रस्तुत करने का कौशल, लेखा-जोखा करने का कौशल एवं प्रभावशाली तथा आनन्ददायक शिक्षण का कौशल का होना जरूरी है। इन सभी कौशलों एवं अभिवृत्तियों के विकास में अध्यापक शिक्षा की अहम भूमिका होती है। विद्यार्थियों को अधिगम शैलियों की पहचान करने, उसके लिए उपयुक्त संचार माध्यम का उपयोग कर विषय को प्रस्तुत करने के लिए उपयुक्त निदेशात्मक प्रणाली का चुनाव करने एवं समय-समय पर उचित निर्णय लेने की क्षमता के विकास में भी अध्यापक शिक्षा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
अध्यापक शिक्षा कार्यक्रम के प्रकार एवं स्वरूप- शिक्षक के वृत्तिक विकास हेतु कई प्रकार के शिक्षक शिक्षा कार्य आयोजित किए जाते हैं। प्रारम्भ में, इसे सेवापूर्व एवं सेवाकालीन प्रशिक्षण दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जाता था। परन्तु, आज शिक्षक शिक्षा का क्षेत्र काफी विस्तृत एवं व्यापक हो गया है। इसमें वैकल्पिक एवं अनौपचारिक शिक्षक शिक्षा तथा विशिष्ट और व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षक शिक्षा कार्यक्रमों को भी शामिल किया गया है।
सेवापूर्ण शिक्षक प्रशिक्षण-शिक्षक बनने से पहले शिक्षकों में आवश्यक दक्षताओं के विकास हेतु इस प्रशिक्षण का प्रावधान है। प्रारंभिक माध्यमिक स्तरों हेतु अलग-अलग तरह के प्रशिक्षण की व्यवस्था है। इन प्रशिक्षणों के माध्यम से शिक्षकों को शिक्षा मनोविज्ञान, शिक्षा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वर्ग कक्ष एवं विद्यालय प्रबंधन तथा विद्यालय में पढ़ाए जानेवाले विभिन्न विषयों की विषय-वस्तु, वर्ग कक्ष विनिमय की तकनीक, शैक्षिक समाजशास्त्र, शैक्षिक दर्शनशास्त्र, शैक्षिक तकनीक, माइक्रो टीचिंग तथा अन्य शैक्षिक कौशल सिखाई जाती है। साथ ही, इन प्रशिक्षण के माध्यम से अधिगम संसाधनों का चयन, संगठन एवं उपयोग करने की दक्षता विकसित करने का कार्य भी होता है। विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शन एवं परामर्श की आवश्यकता से भी अवगत कराया जाता है। वास्तविक परिस्थिति में आकर बच्चों के बीच पाठ विनिमयन कर शिक्षण दक्षताओं की संप्राप्ति संभव हो पाती है, वहीं सूक्ष्म शिक्षण (Micro Teaching) द्वारा बारी-बारी से प्रत्येक कौशलों का विकास भी इस प्रशिक्षण द्वारा होता है। इस प्रशिक्षण के द्वारा शिक्षकों में आवश्यक अभिवृत्ति विकसित करने का भी प्रयास किया जाता है। इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शिक्षकों को इस बात की जानकारी दी जाती है कि बच्चों के सर्वागीण विकास के लिए समुदाय के साथ बेहतर सम्बन्ध आवश्यक है। शिक्षक का बच्चों एवं अभिभावकों से बेहतर व्यवहार शिक्षक को जहाँ सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाता है वहीं शिक्षक में आत्मसंतोष का भाव जाग्रत होता है। इसके अलावा सेवापूर्व प्रशिक्षण के निम्नांकित उद्देश्य हैं :
1. भारतीय संविधान में जिन राष्ट्रीय मूल्य एवं लक्ष्यों की बात की गई हैं, शिक्षकों को उन लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक के रूप में माना गया है। 2. भावी शिक्षकों को आधुनिकीकरण एवं सामाजिक परिवर्तन के अभिकर्त्ता (Agent) के रूप में काम करने के लिए सक्षम बनाना।
3. मानवाधिकार एवं बाल अधिकारों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील बनाना।4. उभरती हुई आधुनिक चुनौतियों यथा- पर्यावरण संरक्षण, जनसंख्या, लिंग भेद इत्यादि के प्रति संवेदनशील बनाना।
5. छात्रों में तार्किक विचार एवं चिंतन शक्ति के साथ-साथ समालोचनात्मक सोच विकसित करने हेतु भावी शिक्षकों में आवश्यक दक्षताओं को विकसित करना।
6. बच्चे अर्जित/सृजित ज्ञान का उपयोग व्यवहारिक जीवन में कर सकें ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित करने में शिक्षकों को सक्षम बनाना।
7. शिक्षकों में प्रबंधात्मक एवं संगठनात्मक कौशलों का विकास करना ।
स्पष्ट है कि सेवाकालीन प्रशिक्षण में भावी शिक्षक में शिक्षण के लिए अनिवार्य दक्षताओं के विकास के साथ-साथ बच्चों को समझकर उनके विकास हेतु योजना निर्माण एवं कार्यान्वयन में दक्ष बनाया जाता है। उनकी अभिवृत्ति में बदलाव लाकर शिक्षक के लिए अनिवार्य गुणों यथा-अध्ययनशील होना, बाल मनोविज्ञान की समझ रखना, अपने शिक्षण तकनीक में सुधार हेतु प्रयासरत होना इत्यादि को विकसित करने का प्रयास किया जाता है ताकि शिक्षक बनने के बाद वे अपनी भूमिका से पूरा न्याय कर सकें।
सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET), प्राथमिक शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय (PTEC), प्रखण्ड संसाधन केन्द्र (BRC) एवं संकुल संसाधन केन्द्रों (CRC) में आयोजित किये जाते हैं अथवा इनके माध्यम से दूसरे जगहों पर आयोजित होते हैं। सेवाकालीन प्रशिक्षण कार्यक्रमों का उद्देश्य सेवारत शिक्षकों की कार्यक्षमता, कुशलता एवं व्यवहारिकता में वृद्धि हेतु हैं। 1986 ई. की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षक शिक्षा को भी शिक्षा के समान ही जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया के रूप में स्वीकृत किया गया है। अतएव सेवाकालीन प्रशिक्षण को भी अपरिहार्य बना दिया गया है। वर्तमान समय में प्रारंभिक स्तर तक के शिक्षकों के लिए तीस दिवसीय सेवाकालीन प्रशिक्षण का प्रावधान है।
राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद् (NCTE) के अनुसार, "उत्तरजीवित दक्षताओं (Survival Competencies) को अद्यतन रूप देने के लिए सेवाकालीन शिक्षक शिक्षा आवश्यक है।" आज का युग ज्ञान के विस्फोट का युग है। शिक्षा के क्षेत्र में हमेशा नवीन विचारधाराओं का उदय हो रहा है जिसके कारण पूरी शिक्षण प्रक्रिया में व्यापक बदलाव आया है। इन बदलावों को समझकर शिक्षक स्वयं में आवश्यक कुशलताएँ विकसित कर अनिवार्यता को समझकर उसके लिए प्रयास करते रहें जिसके लिए सेवाकालीन प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है। पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम एवं पाठ्पुस्तकों के स्वरूप में भी परिवर्तन होने के कारण इन परिवर्तनों के अनुरूप शिक्षकों को स्वयं को ढालने के लिए भी सेवाकालीन प्रशिक्षण आवश्यक है।
कई बार शिक्षक अपने विद्यालय की समस्याओं का हल नहीं कर पाते। इन समस्याओं के कुछ हद तक हल बताने में सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण की अहम् भूमिका है। शिक्षण के क्रम में आनेवाली शैक्षिक समस्याओं जिनका समाधान शिक्षक अपने स्तर से नहीं कर पाते, संकुल एवं प्रखण्ड स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों के द्वारा आसानी से कर लेते
हैं।सेवाकालीन शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम में ज्ञान के अद्यतनीकरण हेतु स्वाध्याय पर बल, साथी अधिगम, सामुदायिक अन्तःक्रिया, आवर्त्ती प्रशिक्षण कार्यक्रमों में प्रतियोगिता एवं निरन्तर शिक्षा कार्यक्रमों का उपयोग किया जाता है। अगर शिक्षक सैदव अपने ज्ञान को अद्यतन नहीं करेंगे तो वे प्रगति की दौड़ में बच्चों को आगे बढ़ाने में पूरी तरह सक्षम बनाने में समर्थ महसूस नहीं कर सकेंगे। शिक्षा में मल्टीमीडिया, सूचना संचार प्रौद्योगिकी ने भी आज अपनी पैठ बनायी हैं। चारों तरफ ज्ञान के स्रोत बिखरे पड़े हैं। इन स्रोतों के प्रभावी उपयोग के लिए प्रशिक्षण काफी उपयोगी है क्योंकि बिना उपयोगी दिशा-निर्देश के इनके उपयोग की कुशलता प्राप्त करना काफी मुश्किल है।
आज परीक्षा का स्थान सतत् व्यापक मूल्यांकन ने ले लिया है। परीक्षा एवं सतत् व्यापक मूल्यांकन (CCE-Continuous and comprehensive Evaluation) दोनों के बीच में फर्क को समझना तथा सतत् व्यापक मूल्यांकन को शिक्षण प्रक्रिया का अभिन्न अंग मानकर उसके अनुसार अपने मानस के निर्माण के लिए सेवाकालीन प्रशिक्षण की उपादयेता स्वयं सिद्ध है। सतत् व्यापक मूल्यांकन की अवधारणा एवं तकनीकों को बिना सतत् प्रशिक्षण के समझना काफी कठिन है।
आज शिक्षक की भूमिका में भी काफी बड़ा बदलाव आया है। पहले जहाँ शिक्षक को ज्ञानदाता माना जाता था वहीं आज इसकी भूमिका सुगमकर्त्ता की हो गई है। यह माना जा रहा है कि शिक्षक किसी को सिखा नहीं सकते बल्कि वे वैसी परिस्थितियों के सृजनकर्त्ता होते हैं जिसमें बच्चा विभिन्न गतिविधियों में भाग लेकर अपने ज्ञान का सृजन करता है। शिक्षक की भूमिका आज गौण हो रही है जबकि बच्चे प्रधान भूमिका में हैं। शिक्षक स्वयं काम करें बच्चों को ज्यादा-से-ज्यादा सोचने-समझने, बोलने एवं क्रिया करने का अवसर प्राप्त हो। शिक्षक अपनी इस बदलती भूमिका को समझकर स्वयं में परिवर्तन ला सकें इसके लिए सेवाकालीन प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है।

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