असुविधाप्राप्त समूहों की शिक्षा पर प्रकाश डालिए d.el.ed 2nd year question paper

 प्रश्न . असुविधाप्राप्त समूहों की शिक्षा पर प्रकाश डालिए । अथवा, असुविधाप्राप्त समूहों को शिक्षा देने के लिए क्या उद्देश्य हैं ? इन संदर्भ में हमारी वर्तमान शिक्षा में क्या किया जाना चाहिए ?




उत्तर- शिक्षा में असमानता को ध्यान में रखते शिक्षा आयोग (1964-66) ने 'Chater VI Towards Equalisation of Education opporutnity' मे वंचित शब्द नहीं लिखा और उसके स्थान पर Backward underpriviliged, scheduled castes and schedule tirbes कहा। इसलिए हमने भी असुविधा प्राप्त समूहों की शिक्षा के अन्तर्गत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े वर्ग की शिक्षा को रखा।


शिक्षा की राष्ट्रीय नीति (1986) के भाग IV (Entitled Education for Equality) में असुविधा प्राप्त शैक्षिक समूहों को 5 भागों में बाँटा गया है।


(i) स्त्रियों की समानता के लिए शिक्षा। (ii) अनुसूचित जाति की शिक्षा


(iii) अनुसूचित जनजाति की शिक्षा (iv) शिक्षा की दृष्टि से दूसरे पिछड़े वर्ग तथा क्षेत्र


(v) विकलांगी की शिक्षा


NCERT" द्वारा प्रकाशित राष्ट्रीय पाठ्यक्रम, 2000 National curriculum Framework for Education में असुविधा प्राप्त समूहों की शिक्षा के प्रति विशेष रूप से ध्यान देने के क्रम में उल्लिखित बातों को इस रूप में कहा गया है—


'एक एकजुट समाज को प्राप्त करने के लिए अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों पर विशेष जोर देने के साथ समाज के विभिन्न वर्गों के लिए शिक्षार्थियों की विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकताओं का जवाब देना आवश्यक होगा।


शिक्षा के क्षेत्र में असुविधाप्राप्त (विशेष रूप से अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति) समूहों को आगे बढ़ाने के लिए उन सुझावों पर सम्यक् ध्यान देना होगा।


वंचित वर्ग की शिक्षा समाज से वंचित वर्ग के प्रति हमारी उदासीनता इतनी अधिक


है कि उनकी इच्छाओं का ध्यान नहीं दिया जाता है। आज भी बहुत से लोगों में अशिक्षा होने से उनके विचारों में रूढ़िवादिता का समावेश है। रूढ़िवादिता अधिकांशत: अनुसूचित जाति के लोगों में अधिक से अधिक होने के कारण अशिक्षा है। ये लोग पुराने पीढ़ी, रीतियों की पीढ़ी दर पीढ़ी चलाना चाहते हैं। उन्हें छोड़ने में वे अपनी पुरानी पीढ़ी का आपमान समझते हैं। लेकिन, शिक्षा के विकास के साथ धीरे-धीरे रूढ़िवादी विचारों में कमी आ रही है।


भारतीय समाज में वर्तमान पतन का एक कारण लड़कियों को शिक्षा से वंचित रखना भी था जबकि एक तरफ हम सभी स्वतन्त्रता का 56वाँ मना रहे है और इस युग को हम "नारी जागरण युग" कहते हैं, किन्तु वास्तव में अब तक नारियों की सामाजिक पराधीनता की बेढ़ियाँ काटकर हम फेंनके में असफल रहे हैं। स्वतन्त्र भारत के संविधान में सभी क्षेत्रों समानता के अवसरों की गारण्टी के बावजूद अभी स्त्रियों को मानवीय रूपों में स्थान नहीं मिल पाय है। एक जाति विशेष में यह समस्या विकराल रूप धारण किये है जबकि स्वयंसेवी संस्थाओं से इस जाति विशेष समस्याओं को शिक्षित होने के लिए महिला शिक्षा समितियों की स्थापना की है। हरिजन बस्तियों में नगर पालिकाओं एवं स्थानीय संस्थाओं द्वारा प्राथमिक विद्यालय खोले गये, जिनमें इन्हें निःशुल्क शिक्षा देने का प्रावधान किया गया। इन संस्थाओं के द्वारा सरकार ने हरिजनों के प्रति उदारता दिखलायी और अनेक नियम बनाकर उनकी शिक्षा को प्रत्येक संभव रीति से प्रोत्साहित किया। फिर भी, अनुसूचित जाति की बालिका 

शिक्षा में वांछित प्रगति नहीं कर पाई। इस सम्बन्ध में अनेक कारणों जैसे निर्धनता एवं गृह


कार्य के अतिरिक्त माता-पिता की अशिक्षा तथा बालिकाओं को शिक्षित करने के प्रति


निरुत्साहपूर्ण दृष्टिकोण भी एक बहुत बड़ा कारण है। समाज के वंचित वर्ग के व्यक्ति अशिक्षित रह जाते हैं क्योंकि ये लोग शिक्षा के महत्त्व को नहीं समझते हैं। परिणाम यह है कि कि शिक्षा-प्रसार के लिए इनके क्षेत्र में समाज की ओर से सरकार को कोई विशेष सहयोग उपलब्ध नहीं होता है। प्रथम तो ये लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजना पसन्द नहीं करते हैं और यदि बच्चे जाते भी हैं तो इच्छानुसार उनका स्कूल जाना बन्द कर देते हैं 1


इसके अतिरिक्त यदि माता-पिता अपने बच्चों को शिक्षा दिलाना भी चाहते हैं तो निर्धनता के कारण वे ऐसा नहीं कर पाते हैं। अनुसूचित जाति के लोग भूमिहीन श्रमिक रहे हैं तथा समाज में अन्य वर्ग में गिने जाने वाले व्यक्तियों की निर्धनता के शिकार होते रहे हैं। निर्धनता के कारण परिवार के सभी सदस्यों को आवश्यक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए एकजुट होकर कार्य करना पड़ता है। परिणामतः आज भी माता-पिता अपने बच्चों को घर पर कार्य में मदद करवाने के लिए रोक लेते हैं कभी-कभी बीच में ही पढ़ने वाले बच्चों को स्कूल जाना बन्द करवा देते है। किन्हीं परिवारों में यदि अभिभावक स्कूल भेजने में सफल हो जाते हैं तो बच्चों को पढ़ाई में आवश्यक अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं करा पाते, जिससे मजबूरी में उन्हें पढ़ाई बीच में छोड़ देनी पड़ती है।


अनुसूचित जातियों को एक बड़ा वर्ग ग्रामों में निवास करता है। ग्रामों में आज भी स्कूलों का अभाव सा है। पिछड़े इलाकों में तो कई गाँव के बीच एक स्कूल हैं। अभिभावक अधिक दूर होने के कारण प्रायः अपने बच्चों को स्कूल भेजने से हिचकते हैं। किन्हीं स्थानों में विद्यालय भी होते है और अस्पृश्य जाति के लोग अपने बच्चों को विद्यालय भेजना शुरू कर देते हैं तो भी उचित सुविधाएँ व माहौल नहीं जुटा पाते हैं जिसमें बच्चे कक्षा में असफल होने लगते हैं जिससे अपव्यय होता है और बार-बार अवरोधन भी जिससे क्षुब्ध होकर ये अपने बच्चों को रोक लेते है और उनकी शिक्षा अधूरी रह जाती है। 1


इसीलिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की शिक्षा को बढ़ावा (prmotion ) देने के लिए Article-15 में लिखा है- देश के सभी नागरिकों को किसी भी शिक्षण संस्थान में योग्यता के असार नामांकन लेने का अधिकार है। इकसे साथ Article 46 में यह लिखा The state shall promote with special care the Educational and Economical interests of weaker sections of the people and inparticular of the scheduled castes and scheduled tribes."


शिक्षा आयोग (1964-66) ने शैक्षिक अवसरों की समानता वाले अध्याय में यह लिखा "शिक्षा की एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक उद्देश्य शिक्षा प्राप्त करने के अवसरों में समानता स्थापित करना है, ताकि पिछड़े हुए या कम अधिकारों वाले वर्ग एवं व्यक्ति अपनी दशा में सुधार करने के लिए शिक्षा को साधन के रूप में अपना सके।" राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में उपसुविधा प्राप्त समूहों की शिक्षा के लिए 'समानता के


लिए शिक्षा' वाले प्रसंग में यह लिखा गया है— "नई शिक्षा नीति विषमताओं को दूर करने पर विशेष बल देगी और अब तक वंचित रहे लोगों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के समान अवसर मुहैया करेगी


1. महिलाओं की समानता हेतु शिक्षा-इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाये जायेंगे : (i) शिक्षा का उपयोग महिलाओं की स्थिति में बुनियादी परिवर्तन लाने के लिए एक साधन के रूप में किया जायेगा।

(ii) महिलाओं से सम्बन्धित अध्ययन को विभिन्न पाठ्यचर्याओं के भाग के रूप में प्रोत्साहन दिया जायेगा और शिक्षा-संस्थाओं को महिला विकास के सक्रिय कार्यक्रम


शुरू करने के लिए प्रेरित किया जायेगा। (iii) महिलाओं में साक्षरता प्रसार को तथा रुकावटों को दूर करने को जिनके कारण लड़कियाँ प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रह जाती है, सर्वोपरि प्राथमिकता दी जायेगी।


2. अनुसूचित जातियों की शिक्षा- अनुसूचित जातियों के शैक्षिक विकस पर बल दिया जायेगा जिससे वे गैर-अनुसूचित जाति के लोगों के बराबर आ सकें। इस मकसद के तहत नई नीति में उपाय सोचे गये हैं:


(i) निर्धन परिवारों को इस प्रकार का प्रोत्साहन दिया जाये कि वे अपने बच्चों को 14 वर्ष की आयु तक नियमित रूप से स्कूल भेज सकें ।


(ii) सफाई कार्य, पशुओं की चमड़ी उतारने तथा चर्म शोधन जैसे व्यवसायों में लगे परिवारों के बच्चों के लिए मैट्रिक-पूर्व छात्रवृत्ति योजना पहली कक्षा से शुरू की जायेगी।


(iii) अनुसूचित जातियों के शिक्षकों की नियुक्ति पर विशेष ध्यान देना । (iv) जिला केन्द्रों पर अनुसूचित जातियों के छात्रों के लिय छात्रावासों की सुविधाएँ क्रमिक रूप से बढ़ाना ।


(v) स्कूल भवनों, बालवाड़ियों तथा प्रौढ़ शिक्षा केन्द्रों का स्थान चुनते समय अनुसूचित जाति के व्यक्तियों की सहूलियत पर विशेष ध्यान देना ।


(vi) अनुसूचित जातियों के लिए शैक्षिक सुविधाओं का विस्तार करने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम तथा ग्रमीण भूमिहीन रोगजार गारण्टी के कार्यक्रम के


साधनों का उपयोग करना । (vii) अनुसूचित जातियों का शिक्षा की प्रक्रिया में समावेश बढ़ाने हेतु लगातार नवीन


तरीकों की खोज जारी रखना। 3. अनुसूचित जनजातियों की शिक्षा-जनजातियों को अन्य लोगों की बारकरी पर


लाने के लिए निम्नलिखित दकम तत्काल उठाये जायेंगे (i) आदिवासी इलाकों में प्राथमिक शालाएँ खोलने का का को प्राथमिकता दी जायेगी।


(ii) आदिवासी भाषाओं के माध्य से प्रारंभ में शिक्षा दी जायेगी।


(iii) पढ़े-लिखे प्रतिभाशाली आदिवासी युवकों को प्रशिक्षण देकर अपने क्षेत्र में ही शिक्षक बनने के लिए प्रोत्साहन दिया जायेगा।


(iv) बड़ी संख्या में आश्रमशलाएँ तथा आवासीय विद्यालय खोले जायेंगे। (v) उच्च शिक्षा के लिए दी जाने वाली छात्रवृत्तियों में तकनीकी तथा व्यावसायिक


पढ़ाई के लिए अधिक महत्व दिया जायेगा ।


(vi) आँगनवाड़ियाँ, अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र तथा प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र आदिवासी बहुल इलाकों में प्राथमिकता के आधार पर खोले जायेंगे।


(vii) आदिवायििों की समृद्ध सांस्कृतिक अस्मिता तथा विशाल सृजनात्मक प्रतिभा के बारे में चेतना सभी स्तरों के पाठ्यक्रमों का अनिवार्य अंग होगी।


4. विकलांग — शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से विकलांगों को शिक्षा देने का उद्देश्य यह होना चाहिए कि वे समाज के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चल सकें। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित उपाय किये जायेंगे :


(i) विकलांगता अगर हाथ पैर की या मामूली सी है, तो ऐसे बच्चों की पढ़ाई आम


बच्चों के साथ हो।

(ii) गम्भीर रूप से विकलांग बच्चों के लिए छात्रावास वाले विद्यालयों की व्यवस्था की जायेगी । ऐसी विद्यालय जिला मुख्यालयों पर स्थापित किये जायेंगे । (iii) विकलांगों के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण की पर्याप्त व्यवस्था की जायेगी । (iv) विकलांगों की शिक्षा के लिए स्वैच्छिक प्रयासों को हर संभव तरीकें से प्रोत्साहित किया जायेगा ।


इन सुझावों के अनुसार बिहार राज्य तथा झारखंड राज्य में असुविधाप्राप्त समाज के सभी समूहों के लिए सरकार ने पर्याप्त कार्य किया है। फिर भी, स्त्री शिक्षा, विकलांगों की शिक्षा, अनुसूचित जाति की शिक्षा, अनुसूचित जनजाति की शिक्षा, पिछड़े वर्ग की शिक्षा के क्षत्र में बढ़ती माँगों के अनुरूप उनमें और सुधारात्मक कार्य करने की जरूरत है ।

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