विद्यालय संगठन आवश्यक तत्व कौन कौन है ? प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। d.el.ed questions answer

 प्रश्न 1. विद्यालय संगठन आवश्यक तत्व कौन कौन है ? प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। 



उत्तर-विद्यालय संगठन के सिद्धान्त- शिक्षा के उद्देश्यों की अधिकतम प्राप्ति •संगठन का कुछ सुविचारित सिद्धान्तों पर आधारित होना परमावश्यक है। अनेक विद्वानों ने • विद्यालय संगठन के विभिन्न सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। उनमें से कुछ प्रमुख एवं मूलभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:

1. बाल केन्द्रित–विद्यालय का मुख्य उद्देश्य बालक का सर्वोन्मुखी विकास करना है। इस दृष्टि से संगठन बाल केन्द्रित होना चाहिए। यह संगठन ऐसा हो जिसके द्वारा बालकों की विभिन्न योग्यताओं, अभिरुचियों, शक्तियों, संवेगों एवं मूल-प्रवृत्तियों को स्वस्थ दिशा में विकसित किया जा सके । संगठन द्वारा विद्यालय में ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जाना चाहिए जिसमें बालक शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं चारित्रिक गुणों को सरलता से प्राप्त कर सकें । विद्यालय की विभिन्न क्रियाओं को उनके विकास की प्रकृति एवं गति, उनकी वैयक्तिक विभिन्नताओं, उनके पूर्व- अनुभवों तथा उनके सामाजिक एवं आर्थिक स्तर को दृष्टिगत रखकर व्यवस्थित की जानी चाहिए। ऐसा करके प्रत्येक बालक को अपना सर्वोत्तम विकास करने के लिए उपयुक्त सुविधाएँ प्रदान की जा सकेंगी।

2. समाज केन्द्रित–संगठन बाल केन्द्रित होने के साथ-साथ, समाज-केन्द्रित भी होना चाहिए, क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य बालकों को समाज का एक सक्रिय, उपयोगी एवं कुशल सदस्य बनाना है। संगठन में बालकों की विकास सम्बन्धी क्रियाओं के आयोजन के साथ-साथ समाज की प्रगति हेतु उचित व्यवस्था का होना भी परमावश्यक है। संगठन के द्वारा समाज में गत्यात्मक उद्देश्य को भी अभिव्यक्त किया जाना चाहिए, जिससे समाज भावी प्रगति की ओर अग्रसर हो सके। अतः विद्यालय संगठन बालक की विकासात्मक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए भी समाज के आदर्शों, आकांक्षाओं, आवश्यकताओं, मूल्यों, संस्कृति आदि पर आधारित होना चाहिए। उदाहरणार्थ

भारत एक कृषि प्रधान देश है, परन्तु वह फिर भी अपने देश की खाद्य सम्बन्धित आवश्यकताओं को पूर्ण करने में असफल रहा है। अनाज के अधिक उत्पादन के लिए कृषि को वैज्ञानिक तथा तकनीकी आधार देना आवश्यक हो गया। इसलिए विद्यालय में कृषि की आधुनिक विधियों के शिक्षण पर बल दिया जा रहा है। आधुनिक माँग के अनुसार देश का औद्योगीकरण भी करना परमावश्यक है इन दृष्टि

से विद्यालयों में आज विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इन्जीनियरिंग आदि विषयों को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है। आधुनिक माँग के अनुसार आज शिक्षा को व्यवसाय या पेशा-केन्द्रित बनाने पर बल दिया जा रहा है जिससे शिक्षित बेरोजगारी को समाप्त किया जा सके ।

3. लोकतंत्रीय सिद्धान्त– जनतंत्र की सफलता हमारे विद्यालयों पर ही निर्भर है। ये • विद्यालय ही हैं जोलोकतंत्रीय सिद्धान्तों के अनुसार संगठन एवं प्रशासन करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है 1. वैयक्तिक भेदों को ध्यान में रखकर विद्यालय में विभिन्न क्रियाओं की व्यवस्था की जाय।

2. असर की समानता प्रदान करने के लिए व्यवस्था की जाये। 3. बालक की स्वतंत्रता को स्वीकार किया जाये। दूसरे शब्दों में छात्रों को स्वतंत्रता प्रदान की जाये।

4. शिक्षकों को व्यवसायिक स्वतंत्रता का उपयोग करने के लिए अवसर प्रदान किए जाये।

5. विद्यालयों में पाठ्यचर्या तथा शिक्षण विधियों को लचीले सिद्धान्त के अनुकूल व्यवस्था किया जाये।

6. विद्यालयी संगठन एवं प्रशासन विकेन्द्रीयकरण के सिद्धान्त पर आधारित किया जाये ।

7. विद्यालय की सम्पूर्ण व्यवस्था को सहयोग के सिद्धान्त पर आधारित किया जाय । 4. उपलब्ध साधनों के अधिकतम उपभोग का सिद्धान्त जैसा कि हम देख चूके हैं, अभीष्ट शैक्षिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विद्यालय संगठन के अन्तर्गत उपलब्ध साधनों का सर्वोत्तम उपयोग होना चाहिए। इस दृष्टि से संगठन द्वारा विभिन्न मानवीय एवं भौतिक तत्वों में अधिक से अधिक सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए। जिससे इनका सर्वोत्तम उपयोग करके शक्ति, समय एवं धन का अधिकतम सदुपयोग हो सके। शिक्षकों की नियुक्ति तथा विद्यालय में प्रयुक्त होने वाली समस्त सामग्री-शिक्षण विधियाँ, पाठ्यक्रम, पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाएँ, पाठ्य पुस्तकें व अन्य साज-सज्जा बालक तथा समाज की आवश्यकताओं व सामर्थ्य को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाये अन्यथा उनका अपव्यय होगा तथा संगठन से पूर्ण लाभ प्राप्त नहीं हो पायेगा।

5. लोच का सिद्धान्त मानव प्रकृति एवं समाज तथा उनकी आवश्यकताएँ परिवर्तनशील हैं। जब विद्यालय का लक्ष्य बालक एवं समाज का उचित दिशाओं में विकास करना है तो इनकी बदलती हुई आवश्यकताओं के अनुकूल विद्यालय संगठन में समय-समय पर परिवर्तन होना भी नितान्त आवश्यक है। अतः विद्यालय संगठन में लोच अथवा परिवर्तनशीलता का गुण होना चाहिए। यदि संगठन में दृढ़ता एवं एकरूपता आ गयी तो यह बालक एवं स्थानीय समाज की माँगों एवं आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ रहेगा।

विद्यालय संगठन के आवश्यक तत्त्व विद्यालय संगठन के अन्तर्गत वे सभी व्यवस्थाएँ आती हैं, जो विद्यालय के प्रबन्ध के लिए आवश्यक है। इसलिए (i) विद्यालय की दिनचर्या (ii) अनुशासन, (iii) परीक्षा, (iv) निरीक्षण, (v) कार्यालय का काम, (vi) अध्यापकों का आदेश. (vii) विद्यालय का स्तर तथा उसका समाज से सम्बन्ध एवं उसकी संरचना, (vii) शैक्षिक परियोजनाएँ, (ix) संयंत्र, (x) भवन, (xi) उपस्कर तथा साज-सज्जा, (xii) खेल का मैदान, (xiii) छात्रावास, पुस्तक आदि सभी व्यवस्थाएँ विद्यालय संगठन के अन्तर्गत आती हैं। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि, "संगठन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा विभिन्न स्वतंत्र तत्वों का चयन एवं उसकी व्यवस्था इस प्रकार करते हैं कि सभी सम्मिलित रूप में कार्यशील हो सके। उसका सम्बन्ध मुख्यतः ऐसी व्यवस्था से है, जिससे सम्पूर्ण शैक्षिक कार्यक्रम सफलतापूर्वक व्यावहारिक रूप से सम्पन्न हो सकें।"

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