प्रश्न . कक्षा क्रियाकलापों की आयोजना और संगठन किस प्रकार किया जाए ? वर्णन करें।
उत्तर–आयोजना का अर्थ है तैयारी (preparation) और संगठन का अर्थ है सभी अंगो उपागमों को व्यवस्थित और क्रमबद्ध करना (organisation) ताकि उचित प्रतिफल मिल सके।
अतः कक्षा आयोजना और संगठन में इस बात का ध्यान रखते हैं कि कौन-सा याकलाप का चयन किया जाय, उसे किस प्रकार कराया जाय, बच्चों को कहाँ और किस प्रकार बैठाया जाय ताकि सभी बच्चे भाग ले सकें।
क्रियाकलाप की आयोजना एवं संगठन करते समय निम्न बातों पर ध्यान देंगे (i) पाठ के उद्देश्यों का निर्धारण कर लेंगे कि पाठ पढ़ लेने के बाद बच्चे में
कौन सी दक्षता विकसित होगी।
(ii) विद्यार्थियों को दिए जाने वाले निर्देशों की सूची बना लेंगे।
(iii) आवश्यक सामग्री की सूची बना लेंगे।
(iv) कक्षा का संगठन इस प्रकार करेंगे कि शिक्षक और शिक्षार्थी, शिक्षार्थी और दूसरे शिक्षार्थों में अंतःक्रिया आसानी से हो सके। बच्चों को समूह में बैठने का उचित स्थान हो ।
(v) बैठने की व्यवस्था में समय-समय पर परिवर्तन करते रहेंगे ।
(vi) बच्चों के साथ मिलकर क्रियाकलाप आयोजित करेंगे। (vii) बच्चों को कक्षा में सामग्री लाने और उसका उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे ।
क्रियाकलाप का आयोजन बृहद समूह में कहानी सुनाकर, परिचर्चा के द्वारा कर सकते हैं। लघु समूह में भी कर सकते हैं। कक्षा के शहर में भी कर सकते हैं, जिसकी क्रियाविधि निम्नलिखित है—
समूह क्रियाकलाप (Group Activities) अंतःशालीय क्रियाकलाप
अर्थ समूह क्रियाकलाप से तात्पर्य है, ऐसे क्रियाकलाप जो बच्चों को कई समूह में बाँटकर कराए जाते हों। समूह के प्रत्येक सदस्य अपनी जिम्मेदारी निभाते को संपन्न करते हैं। संपन्न होने के बाद कक्षा में चर्चा होती है और सुझाव दिए जाते हैं। हुए कार्य
लाभ:
(i) शिक्षण अधिगम प्रक्रिया प्रभावी हो जाती है
(ii) क्रियाकलाप से बच्चों में मिलजुलकर करने की आदत विकसित होती हैं। (iii) अधिगम स्थायी, रोचक और लाभप्रद होता है। (iv) बच्चों में अपने कार्य के प्रति जिम्मेदारी की भावना आती है।विधि :
(i) एक समूह में पाँच या छह से अधिक बच्चे नहीं होने चाहिए।
(ii) समूह के प्रत्येक बच्चे को कार्य आवंटित करेंगे। जैसे—एक बच्चा प्रयोग करेगा, दूसरा आँकड़े और तथ्यों को लिखेगा, तीसरा परिणाम प्रस्तुत करेगा। (iii) प्रत्येक समूह में एक बच्चे के नेतृत्व में कार्य कराएँगे ।
(iv) समूह के विभिन्न सदस्यों की भूमिकाओं में परस्पर परिवर्तन करेंगे।
(v) प्रत्येक समूह को अलग-अलग कार्य देंगे।
(vi) विभिन्न समूह अपने-अपने अनुभवों का आदान प्रदान करते रहें, इसके लिए भी अवसर प्रदान करेंगे ।
(vii) क्रियाकलाप की समाप्ति पर कक्षा में चर्चा कराएँगे, ताकि शंकाओं का निवारण हो सके, निष्कर्ष निकाले जा सकें। (viii) बच्चों के कार्य को कक्षा में प्रदर्शित करेंगे।
2. बहि:शालीय (कक्षा से बाहर आयोजित) क्रियाकलाप (Out door activities)–ऐसे क्रियाकलाप कक्षा से बाहर किए जाते हैं। पर्यावरण अध्ययन के शिक्षण के लिए कक्षा से बाहर किए जाने वाले क्रियाकलाप अत्यंत आवश्यक हैं। इसमें समूह
क्रियाकलाप के सारे कार्य किए जाते हैं और अन्य कार्य निम्नलिखित हैं (i) क्रियाकलाप के लिए जहाँ भी ले जाना है, उस स्थान का चयन पहले ही
कर लेते हैं ।
(ii) उस स्थान पर क्रियाकलाप में उपयोगी सामग्री का होना जरूरी है। (iii) बाहर जाने से पहले कक्षा में चर्चा कर लेते हैं। कार्य का लिखित बँटवारा, क्रियाकलाप संबंधी जानकारी समूह के नेता को लिखित रूप में दे देते हैं।
(iv) प्रत्येक बालक को बता देते हैं कि उसे कौन-सी सामग्री ले जानी है। कागज,
कलम, मापने के लिए फीता, थैले, पुराने अखबार बोतल आदि उपयोगी सामग्री की सूची बना लेते हैं। (v) क्रियाकलाप समाप्ति के बाद कक्षा में लौटकर कुछ अनुवर्ती कार्य करते हैं,
चर्चा करते हैं, अतः इसके लिए समय निकालना जरूरी है। (vi) एक लघु प्रदर्शनी का आयोजन करते हैं, ताकि बच्चे अपने कार्य को प्रदर्शित कर सकें ।
(vii) क्रियाकलाप को भाषा, कला, गणित, विषयों के साथ जोड़ते हैं ताकि
समाकलित अधिगम हो सके।
शिक्षक की भूमिका :
(i) शिक्षार्थी के सह-शिक्षार्थी बनें।
(ii) शिक्षार्थियों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाना चाहिए।
(iii) मंद शिक्षार्थियों की ओर ध्यान देना चाहिए। उन्हें क्रियाकलाप को संपन्न करने में प्रोत्साहित करेंगे।
(iv) शिक्षक को स्वयं नवीन ज्ञान प्राप्त करना जरूरी है ताकि प्रकरण के बारे में नई जानकारी दी जा सके।
प्रश्न . अध्ययन का शिक्षण बच्चों को अपनी वर्तमान समझ को व्यवस्थित करने का अवसर कैसे प्रदान करते हैं ? उदाहरणों के द्वारा समझाएँ ।
उत्तर- बच्चे स्वभाव से ही जिज्ञासु व खोजी प्रवृत्ति के होते हैं। वे निरन्तर अपने आस-पास की दुनिया से अंतःक्रिया करते रहते हैं और उसे समझने का प्रयास करते हैं। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, वैसे-वैसे ही उनके विचार और सोच व्यापक होते जाते हैं। और उनके अनुभवों में गहराई आती जाती है। अतः एक शिक्षक होने के नाते हमारा दायित्व हो जाता है उनके इन अनुभवों को और विस्तार मिले। बच्चे अपनी वर्तमान समझ को व्यवस्थित कर पाएँ और उचित मार्गदर्शन की सहायता से समझ के दायरे को बढ़ाकर दुनिया में अपना अस्तित्व बना पाएँ। इन सभी विचारों को ध्यान में रखते हुए प्राथमिक स्तर पर पर्यावरण अध्ययन के निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं—
बच्चों को दक्ष बनाना ताकि वे प्राकृतिक व सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण के बीच के अंतर्संबंध को देख पाएँ। इसके साथ ही अपने शब्दों में इन अंतसंबंधों की व्याख्या भी कर पाएँ ।
अमूर्त उदाहरणों की बजाए दैनिक जीवन, सामाजिक, सांस्कृतिक व जीवजगत से जुड़े अनुभवों के अवलोकन व चित्रण की मदद से बच्चों में समझ विकसित करना ।
प्राकृतिक पर्यावरण से जुड़ी बच्चों की जिज्ञासा व सृजनात्मकता का पोषण करना । यहाँ प्राकृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत मनुष्य व मनुष्य द्वारा निर्मित वस्तुएँ भी शामिल हैं।
बच्चों को प्राकृतिक संसाधनों की देखरेख और संरक्षण के प्रति सजग बनाना ।
पर्यावरणीय मुद्दों के बारे में जागरुकता विकसित करना । बच्चों को हाथ से की जाने वाली व विश्लेषणात्मक गतिविधियों में व्यस्त रखना ताकि उनमें मूलभूत संज्ञानात्मक व मनोगत्यात्मक कौशलों यथा वर्गीकरण, अवलोकन, निष्कर्ष निकालना, तुलना आदि का विकास हो सके।
आगे जाकर तकनीकी व मात्रात्मक कौशलों का विकास हो सके। अतः डिजाइन, निर्माण, अनुमान लगाना व मापन संबंधी गतिविधियों/कार्यों पर जोर देना । बच्चों को इस योग्य बनाना कि वे जेण्डर, हाशियाकरण एवं दमन जैसे मुद्दों को बना सकते है ।
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