प्रश्न 'खेल' का अर्थ समझाएँ। खेल की विशेषताओं पर प्रकाश डालें। अथवा, बालकों के खेल की चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-खेल का अर्थ (Meaning of Play)- खेल बच्चों की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। खेलों के द्वारा बालक के शारीरिक, मानसिक तथा संवेगात्मक विकास के साथ-साथ सामाजिक अन्तःक्रिया का विकास होता है। खेलों को बालकों की वृद्धि और विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान होता है।
खेल की क्रिया अहम-प्रेरित (Self-Motivated) होती है तथा आनन्ददायक भी होती है. खेल की क्रिया बच्चों में उत्साह, स्फूर्ति, आत्म विश्वास, चंचलता, प्रसन्नता आदि गुणों का विकास करती है। आधुनिक युग में खेल के महत्व को विद्वानों ने स्वीकार किया है। इसीलिए विभिन्न शखाओं में खेल से जुड़ी विभिन्न क्रियाओं को शामिल किया गया है। जैसे-ड्रामा, संगीत, विभिन्न खेल इत्यादि। आजकल दूरदर्शन और रेडियो के माध्यम से भी 'खेलों' के महत्व को दर्शाया एवं बताया जा रहा है। खेलों से जुड़े खिलौनों के प्रयोग के माध्यम से बच्चों के बौद्धिक विकास को बल प्रदान किया जा रहा है। ग्रास (Gross) के विचारानुसार खेलों के द्वारा बच्चे विभिन्न कौशलों का अभ्यास करते हैं।
क्रो एवं क्रो (Crow & Crow) ने खेल को इस प्रकार परिभाषित किया है-: "खेल वह क्रिया है ,जिसमें एक व्यक्ति उस समय व्यस्त होता है जब वह उस कार्य को करने के लिए स्वतंत्र होता है जिस कार्य को वह करना चाहता है। ("Play can be defined as the activity in which a person engages when he is free to do what he wants to.")
हरलॉक (Hurlock, 1978) के अनुसार, "खेल वह कोई भी क्रिया है जो प्राप्त होने वाले आनन्द के लिए की जाती है परंतु इसके अन्तिम परिणाम पर कोई विचार नहीं किया जाता है।"
("It means any activity engaged in for the enjoyment it givews, without consideration of the end result." - Hurlock, 1978)
रसेल (Russel) के अनुसार, "खेल एक आनन्ददायक शारीरिक या मानसिक क्रिया है जो अपने आप में पूर्ण है और जिसका कोई अव्यक्त लक्ष्य नहीं होता है।" ("Play may be defined as a joyful bodily or mental activity which is sufficient to itself & does not seek any ulterior gola."-Russel.)
कुछ लोगों ने खेल को रचनात्मक क्रियाओं की अभिव्यक्ति माना है तथा कुछ लोग इसे आनन्दपूर्ण स्वाभाविक तथा रचनात्मक क्रिया कहा है। वेलनटाईन (Valentine) के अनुसार खेल किसी कार्य में एक प्रका का मनोरंजन है। अत: 'खेल' (Play) एक स्वाभाविक (Spontaneous) और आत्म-प्रेरित (Self-Motivated) शारीरिक या मानसिक क्रिया है जो अपने आप में पूर्ण है तथा जिसका कोई अव्यक्त लक्ष्य नहीं होता। इसके परिणाम पर कोई विचार नहीं किया जाता है ।
फ्रबल (Frobel) के अनुसार, "बच्चे के विकास का सर्वोत्तम रूप खेल हो सक्रियात्मक होता है तथा अन्त:करण का वास्तविक प्रतिनिधित्व करता है। यह प्रसन्नता तथा संतोष प्रदान करता है, आन्तरिक और बाहरी आराम होता है। खेल की विशेषताएँ (Characteristics of Play) : खेल की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित होती हैं
1. खेल स्वतंत्र होते हैं। वास्तव में यह स्वतंत्रता है। 2. खेल 'साधारण' (Ordinary) या वास्तविक जीवन नहीं होते।
3. खेल 'साधारण जीवन' (Ordinary life) से भिन्न होते हैं।
3. खेल 'व्यवस्था' (Order) पैदा करते हैं, खेल के लिए 'व्यवस्था' (Order) चाहिए।
5. खेल का सम्बन्ध किसी भौतिक रुचि से नहीं होता तथा इनमें से कोई ‘लाभ' भी
उठाया नहीं जा सकता।
6. खेल एक स्वाभाविक (Spontaneous) प्रवृत्ति है। 7. यह एक आत्म-प्रेरित शारीरिक मानसिक क्रिया है।
8. खेल शारीरिक या मानसिक क्रिया है। 9. यह स्वयं में पूर्ण होती है।
10. खेल बच्चों में स्फूर्ति और चंचलता पैदा करते हैं।
11. बच्चे खेल की अन्तिम परिणाम पर कोई विचार नहीं करते।
12. खेल का कोई गुप्त लक्ष्य नहीं होता। केवल प्रत्यक्ष लक्ष्य होते हैं।
13. खेल का मुख्य लक्ष्य आनन्द और स्वतंत्रता की प्राप्ति होती है। 14. खेल को जन्मजात प्रवृत्ति माना है लेकिन यह सही नहीं है क्योंकि खेल सीखने और वातावरण पर आधारित है।
15. प्रत्येक खेल में रचनात्मकता (Creativeness) का पाया जाना आवश्यक नहीं। 16. खेल से बालक में संतुष्टि का संचार होता है।
17. खेल बच्चों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। 18. खेल स्वेच्छा पर आधारित होता है।
19. खेल आराम के रूप में भी कार्य करता है।
बच्चों के खेल की विशेषताएँ (Characteristics of Children's Play) : प्रौढ़ व्यक्तियों की अपेक्षा बालकों में खेल की भिन्न विशेषताएँ होती हैं जोकि निम्नलिखित हैं :
1. परम्पराओं से प्रभावित (Influenced by Traditions)- समाज या देश से जुड़ी परम्पराओं से भी बालकों के खेल अत्यधिक प्रभावित होते हैं। बच्चे आमतौर पर अपने बड़ॉ से कुछ न कुछ सीखते हैं, लेकिन फिर भी वे उनसे कुछ न कुछ नयापन जोड़ देते हैं, इस प्रकार के नयेपन की वृद्धि हर पीढ़ी (Generation) करती रहती है। यह किसी बालक विशेष का कार्य नहीं होता है।
2. दिवास्वप्न अवस्था (Stage of Dary Dreaming)-दिवास्वप्न की अवस्था का प्रारम्भ लगभग दस वर्ष की आयु से हो जाता है। इसके पश्चात् धीरे-धीरे मन खेल से दूर होने लगता है तथा वह खाली समय में बैठकर दिवास्वप्न देखने लगता है। आयु बढ़ने के साथ-साथ उसके दिवास्वप्नों की प्रकृति बदलने लगती है।
.3. खोजक अवस्था (Exploratory Stage) बालकों के खेल का विकास एक निश्चित क्रम से होता है तथा सबसे पहली अवस्था खोजक-अवस्था होती है। इस अवस्था के दौरान बच्चा जो भी चीज देखता है उसे झपटने का प्रयास करता है। इस अवस्था से उसके हाथों में क्रियात्मक और कौशलों (Skills) का विकास प्रारम्भ हो जाता है। कुछ समय के पश्चात् वह घिसटकर (Crawling) चलने लगता है। वह गेंद आदि के पीछे घिसटता है। इसके पश्चात् ही वह चलना सीखता है।
4. खिलौना अवस्था (Toy Stage)- एक वर्ष की अवस्था से बालक का खिलौनों से खेल शुरू हो जाता है। आठ वर्ष की अवस्था तक बालकों का खिलौनों के साथ खेलना चरम सीमा तक पहुंच जाता है। लगभग दो वर्ष की आयु तक बालक यह समझता है। खिलौनों में भी जीवन है।
5. खेल अवस्था (Play Stage)-एक वर्ष के पश्चात् जब बच्चा ठीक प्रकार से चलना कर देता है तब वह दूसरे बच्चों के साथ खेलना शुरू कर देता है। शुरू में वह दूसरे द के साथ खिलौनों से खेलता है लेकिन आयु बढ़ने के साथ-साथ वह दूसरे खेलों में भी साथ लेना शुरू कर देता है। आठ-नौ वर्ष तक वह खिलौने के साथ खेलते हुए दौड़ने लगता है और सामूहिक खेलों में अधिक रुचि लेने लगता है। स्कूल शुरू होने पर वह नये-नये बच्चों के साथ मिलकर वह नये-नये खेल सीखता है। इसी अवस्था से उसमें 'शौक' विकसित होने लगती है। (Hobbies)
6. आयु के साथ क्रियाओं में कमी (Decrease in Activities with Age) जैसे-जैसे बच्चे की आयु बढ़ती है, वैसे-वैसे उसकी खेल-क्रियाएँ भी कम होती चली जाती हैं। इस कमी का मुख्य कारण होता है पढ़ने, लिखने तथा काम की ओर उन्मुख होना। साढ़े सात वर्ष की अवस्था में खेल-क्रियाओं (Play Activities) की औसत संख्या 27, साढ़े ग्यारह वर्ष की अवस्था में 21 तथा साढ़े सोलह वर्ष की आयु में यह औसत केवल 13 रह जाता है। आयु बढ़ने के साथ-साथ बच्चों के दोस्तों की संख्या में भी कमी आ जाती है इसलिए भी खेल-क्रियाएँ कम होने लगती हैं।
7. बालकों के खेल में भिन्नता (Variation in Play) यह आम तौर पर देखा जाता है क सभी बच्चों के खेल खेलने में अन्तर रहता है। ये अन्तर खेल खेलने के तरीकों में अन्तर हो के कारण होता है
8. यौन उपयुक्तता (Sex Appropriateness) बाल्यकाल में सभी बच्चे (लड़के तथा लड़कियाँ) लगभग एक समान खेलते हैं। लेकिन 3-4 वर्ष की आयु से उनके खेलों में भी अन्तर आने लगता है। स्कूल जाने की अवस्था तक तो यह अन्तर और भी अधिक हो जाता है।
9. खेल में अनौपचारिक से औपचारिक परिवर्तन (Play Changes from Informal to Formal)- प्रारम्भिक अवस्था में बालकों के खेल में किसी प्रकार की औपचारिकता नहीं होती। उनका खेल स्वाभाविक होता है। बालक कहीं पर भी, किसी के साथ भी तथा कितनी भी देर तक खेलता रहता है। इस दौरान उन्हें किसी भी पाबन्दी का ध्यान नहीं रहता। लेकिन आयु तथा समझ बढ़ने के साथ-साथ उन्हें खेलों के औपचारिक नियमों का ज्ञान होने लगता है तथा वे खेल की औपचारिक ड्रेस पहनकर खेलना चाहते हैं। इस प्रकार उनमें खेल से जुड़ी औपचारिकताएँ आने लगती हैं। बारह-तेरह वर्ष की आयु तक वे नियमानुसार खेलने लगते हैं।
10. शारीरिक क्रियाओं से जुड़े खेलों में कमी (Decrease in Plays involving Physical Activities) आयु बढ़ने के साथ-साथ शारीरिक क्रियाओं से जुड़े खेलों में कमी आने लगती है। जैसे-जैसे उनकी मानसिक योग्यताओं का विकास होता रहता है, वैसे-वैसे बच्चे मानसिक खेलों में अधिक रुचि लेने लगते हैं। जैसे-रेडियो सुनना, टी.वी. देखना, खेल खेलना, शतरंज, कैरम खेलना, ताश खेलना इत्यादि।
11. खेल की क्रियाओं में विशिष्टता का आना (Specificity in Plan Activities) प्रारम्भिक अवस्थाओं में खेल की क्रियाओं में विशिष्टता का अभाव रहता है क्योंकि उनके ध्यान का विस्तार सीमित होता है। उनकी मानसिक और शारीरिक योग्यताएँ भी सीमित होती है ।
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