उत्तर-स्कूल शिक्षा का महत्वपूर्ण, श्रेष्ठ तथा सक्रिय साधन है। बालक के व्यक्तित्व के विकास में स्कूल की महत्वपूर्ण भूमिका है। पाँच वर्ष की आयु तक बालक की समस्त सामाजिक अन्तः क्रियाएँ माता-पिता तथा अन्य परिवारजनों के साथ संबंधित होती है। पाँच -छः वर्ष की आयु में जब बच्चा स्कूल में प्रवेश करता है तब उसकी अन्तःक्रियाओं का दायरा बढ़ जाता है। स्कूल के मित्रों और अध्यापकों के साथ उसकी अन्तःक्रियाएँ प्रारम्भ हो जाती हैं। लगभग सात वर्ष की अवस्था में बालक की अन्तःक्रियाएँ अधिक बढ़ने लग जाती है। ग्यारह-बारह वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते उसकी स्कूल से संबंधित अंतःक्रियाएँ परिवार की अपेक्षा अधिक हो जाती है। स्कूल बच्चे के विकास पर निम्नलिखित ढंगों से प्रभाव डालता है ।
1. स्वस्थ आदतों का निर्माण-विद्यालय में एक छात्र का 'सीखना' और 'उपलब्धि' किस प्रकार की होगी, यह बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर है कि अध्यापक और विद्यार्थियों के संबंध किस प्रकार के हैं। एक छोटे बच्चे के लिए अध्यापक माँ का प्रतिस्थापित रूप है। कुछ और बड़े बच्चों के लिए शिक्षक वह वयस्क व्यक्ति है जो आदरणीय और प्रशंसा पाने वाला है तथा जिसके व्यवहार का अनुकरण करना चाहिए। अतः यह आवश्यक है कि अध्यापकों में प्रभावशाली, आदर्श एवं अनुकरणीय गुण और विशेषताएँ होनी चाहिए। प्राय: यह देखा गया है कि अध्यापक की अभिवृत्तियों के प्रति विद्यार्थी अधिक संवेदनशील होते हैं तथा उनका अनुकरण करते हैं। इसीलिए अध्यापक की अच्छी आदतों का व्यक्तित्व के विकास पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि अध्यापक स्वभाव से नम्र, बोलने में विनीत तथा व्यवहार में अच्छा है तो बच्चा भी वही आदतें सीखता है। लेकिन अगर अध्यापक का स्वभाव बोलने में कठोर तथा व्यवहार में अकुशल है तो बच्चा भी उन्हीं आदतों का अनुकरण करता है।
2. स्कूल तथा अनुशासन-बालक मुख्यतः अनुशासन अपने संरक्षकों व अध्यापकों से सीखता है। अनुशासन के द्वारा समाज में मान्य नैतिक व्यवहार को सिखाया जाता है। विद्यालय का अनुशासन बालक के व्यवहार और अभिवृत्तियों को महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करता है। यदि अध्यापक कक्षा में डरा-धमका कर या मार-पीट कर अनुशासन कायम रखता है, तो कक्षा के विद्यार्थी भी कठोर स्वभाव वाले हो जाते हैं। इसे बाहरी अनुशासन कहते हैं। लेकिन आजकल बच्चों को इस प्रकार की शिक्षा देनी चाहिए कि ये स्वयं अनुशासन में रहना सीखें। इसे आंतरिक अनुशासन कहते हैं। इस प्रकार के अनुशासन से बालकों में अनेक व्यक्तिगत विशेषताएँ उत्पन्न हो जाती आदि। जैसे प्रसन्नता, सहयोग, आत्म-महत्व और विश्वास की योग्यता होती है ।
3. स्कूल तथा व्यक्तित्व संरक्षकों के बाद, बालक के व्यक्तित्व विकास पर स्कूल का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। स्कूल में बच्चा केवल अपने सहपाठियों तथा शिक्षकों आदि के व्यवहार से ही प्रभावित नहीं होता है बल्कि स्कूल का सामान्य वातावरण भी बच्चे के व्यवहार को प्रभावित करता है। उसे विभिन्न सामाजिक व आर्थिक स्तर के बच्चों के साथ मिलने का अवसर मिलता है। वह इन सभी प्रकार के बच्चों की आदतों, विचारों और चरित्र आदि से प्रभावित होता है। इसके अतिरिक्त कक्षा का वातावरण, अध्यापक का व्यक्तित्व व व्यवहार, अनुशासन, स्कूल में पक्षपात, शैक्षिक उपलब्धि, सामाजिक उपलब्धि आदि कारक बच्चे के व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करते हैं।
4. स्कूल तथा चरित्र निर्माण परिवार के बाद स्कूल का बच्चे के नैतिक और चारित्रिक विकास पर महत्वपूर्ण ढंग से प्रभाव पड़ता है। स्कूल के शिक्षक, सहपाठी तथा वातावरण आदि सभी बालक के नैतिक विकास में योगदान देते हैं। स्कूल में बालक के पाठ्यक्रम और अनुशासन का भी उसके नैतिक मूल्यों के विकास पर महत्वपूर्ण ढंग से प्रभाव पड़ता है। जिस स्कूल का सामान्य अनुशासन और व्यवस्था ठीक-ठीक होती है वहाँ पढ़ने वाले बालकों के चारित्रिक विकास के लिए सुन्दर वातावरण मिलता है। स्कूलों में बालकों के नैतिक विकास पर उसके साथी समूह का भी महत्वपूर्ण ढंग से प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए यदि बच्चे के साथी दुराचारी हैं तो निश्चय ही बालक में भी इसी प्रकार के व्यवहार प्रतिमान विकसित होंगे। ठीक इसके विपरीत अच्छे व्यवहार, आचार व विचारों वाले साथी बच्चे के उच्च चरित्र निर्माण में सहायक सिद्ध होते हैं।
5. स्कूल तथा सामाजिक विकास स्कूल में शिक्षक और बालक के मित्र भी बालक के सामाजिक विकास में योगदान देते हैं। स्कूल में बालक को अपनी आयु के अनेक बालकों के साथ बैठने तथा सीखने का अवसर ही नहीं मिलता है बल्कि उसे बड़े बच्चों के सामाजिक अनुभव सुनने और सामाजिक व्यवहार देखने का अवसर भी मिलता है। इन अवसरों से उसकी सामाजिक सूझ और सामाजिक प्रत्यक्षीकरण बढ़ता है। फलस्वरूप वह समाज के विभिन्न मूल्यों से संबंधित व्यवहार को सीखता है। स्कूल के अनेक कार्यक्रमों में भाग लेकर वह अपने सामाजिक व्यवहार प्रतिमानों को सीखता है। स्कूल में वह सहयोग, मित्रता और आत्मनिर्भरता आदि गुणों की भी सीखता है।
प्रश्न . 2 बाल्यावस्था (2-12) का व्यक्तित्व विकास के बारे में बताएँ।
उत्तर-इस आयु को दो भागों में बाँटा जाता है। प्रथम है : “पूर्व विद्यालयी बालक" जो 3 से 6 वर्ष तक की आयु का समय होता है। दूसरा है- विद्यालयी बालक। यह अवस्था 7 से 12 वर्ष की होती है। इसी आयु से ही विकास से सम्बन्धित आरम्भिक लक्षण दृष्टिगोचर होने लगते हैं। बच्चे में मैत्री भाव पनपता है। वह दूसरों को प्रभावित करने का प्रयास करता है। किन्हीं छोटी-मोटी बातों पर उसे निर्णय लेना भी आ जाता है। दो-तीन वर्ष का होते ही, नित्य नए रूप लेता, उसका व्यक्तित्व उभरने लगता है और अब जन्म के समय की अवस्था से स्पष्ट अन्तर भी दिखाई देने लगता है। व्यक्तित्व-सम्बन्धी गुणों का प्रस्फुटन आरम्भ हो जाता है। बच्चा माँ से बहुत ज्यादा आसक्ति दिखाता है। बड़े भाई-बहनों के प्रति कभी स्नेह, कभी ईर्ष्या का प्रदर्शन करता है। छोटे भाई-बहन से सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार कर सकता है परन्तु उस सम्बन्ध में कभी-कभी ईर्ष्या उग्र रूप में दिखाई देती है। परिवार के लोगों के सम्बन्ध का निर्वाह करता है, साथ ही बाहर से आने वाले लोगों से भी घुल-मिल जाता है। इन सम्बन्धों में वह अपने व्यक्तित्व के गुणों को प्रदर्शित करता है जो सर्वथा आरम्भ की स्थिति में अर्थात् अंकुरन की अवस्था में रहते हैं। विद्यालयी बच्चे, जो लगभग 7-12 की आयु वर्ग के होते हैं, अपने कार्यों में हस्तक्षेप नहीं पसन्द करते हैं, परन्तु स्नेह और सुरक्षा के लिए अवश्य ही लालायित रहते हैं। भाई-बहन, छोटे हों या बड़े, उनसे उसके आरम्भिक सामाजिक सम्बन्ध शुरू हो जाते हैं। छोटे भाई-बहनों का दुलार-प्यार, उसे समझाना-बुझाना सब कर सकता है। साथ-ही बड़े भाई-बहनों के प्रति प्रशंसा भाव रखता है तथा उनकी तारीफ अपने साथी बच्चों में करता है। घर-परिवार के लोगों से उसका व्यवहार मैत्री-पूर्ण रहता है क्योंकि उसे उनकी हर कदम पर मदद की जरूरत रहती है। वह स्वतंत्र रहना चाहता है परन्तु बड़ों की छत्रछाया में ही पूर्ण स्वतंत्रता को प्राप्त करने का प्रयास करता है। वह अभी भी उन पर आश्रित रहता है। उन्हीं की मदद से कहीं बाहर घूम-फिर सकता है, इस बात को वह समझ जाता है। बाहर के लोगों से भी इस आयु का बच्चा नम्रतापूर्ण और मैत्री-भावयुक्त व्यवहार करता है। बच्चों से सम्पर्क बढ़ाने के लिए उत्सुक रहता है, खेल के साथी खोजता है, नये साथी का स्वागत करता है और उसे स्वीकार करता है। इस आयु को मित्र बनाने की आयु भी कहा जा सकता है। मित्र से सहानुभूति और प्यार जता लेता है। उससे खेलने में भी बहुत समय तक मगन रहता है। यदि उनसे उसकी रुचि मिल जाती है तो ऐसी भिन्नता अपेक्षाकृत देर तक रहने वाली साबित होती है, परन्तु यदि दूसरा बच्चा आक्रामक, क्रोधी या झगड़ने वाला होता है तो बच्चा उससे अलग रहना ही ठीक समझता है। मित्रता की इच्छा से वह साथियों को आजमा लेता है तथा अपने अच्छे गुणों का ही प्रदर्शन करता है कि मित्र बराबर उसके साथ बना रहे और खेलता रहे। इस आयु में बालक के व्यक्तित्व स्थिर रूप धारण करने लगते हैं। गुण अंकुरित और पोषित होकर पनपने लगता है ।

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