राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर उनके कुछ महत्वपूर्ण विचार । 30 जनवरी । शहीद दिवस


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर उनके कुछ महत्वपूर्ण विचार  

30 जनवरी 

शहीद दिवस 



 1.समाजवादी व्यवस्था



अगर मैं देश को अपने दृष्टिकोण से सहमत कर सकूं तो भावी सामाजिक व्यवस्था मुख्य रूप से चरखा और उससे जुड़ी बातों पर आधारित होगी। इसमें वे सभी चीजें शामिल होंगी जिनसे ग्रामवासियों के कल्याण में वृद्धि होती हो। इसमें उद्योग त्याज्य नहीं होंगे... जब तक कि वे गांवों और ग्रामवासियों का गला घोंटने वाले न हों

मेरी कल्पना के अनुसार गांव की दस्तकारियों के साथ-साथ बिजली, पोत निर्माण, लोहे के कारखाने, मशीन बनाने के कारखाने आदि भी रहेंगे। किंतु निर्भरता का क्रम उलट जाएगा। अभी तक औद्योगीकरण की योजनाएं इस प्रकार बनाई गई हैं कि वे गांवों और गांवों की दस्तकारियों को नष्ट कर दें। भारत के भावी राज्य में देश के उद्योग गांवों और उनकी दस्तकारियों के सहायक की भूमिका निभाएंगे।


2.अहिंसक आधार


मैं इस समाजवादी विश्वास को सही नहीं मानता कि यदि केंद्रीकृत उद्योगों की आयोजना और स्वामित्व राज्य के हाथ में हो तो जीवन के लिए अनिवार्य वस्तुओं का केंद्रीकरण सार्वजनिक कल्याण में सहायक होगा। पश्चिम की समाजवादी धारणा का जन्म हिंसा के वातावरण में हुआ था। पश्चिम के ढंग के और पूर्व के ढंग के समाजवाद के पीछे मंतव्य एक ही है- सम्पूर्ण समाज का अधिकतम कल्याण और उन भयंकर असमानताओं का उन्मूलन जिनके परिणामस्वरूप लाखों-करोड़ों लोग निर्धन हैं और मुट्ठी भर लोग 'धनी' हैं। मेरा विश्वास है कि इस ध्येय की प्राप्ति तभी हो सकती है जब दुनिया के प्रखरतम बुद्धि वाले लोग अहिंसा को न्यायोचित सामाजिक व्यवस्था के निर्माण का आधार मान लें। मेरी पक्की धारणा है कि सर्वहारा की हिंसा के द्वारा सत्ता प्राप्ति अंततः असफल हो जाएगी | जो चीज़ हिंसा के द्वारा हासिल की जाती है, उसका अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली हिंसा के हाथों अंत अवश्यंभावी है। 

स्वाधीनता की शुरुआत नीचे से होनी चाहिए। तदनुसार प्रत्येक गांव एक गणतंत्र अथवा पंचायत का रूप लेगा जिसे पूरी शक्तियां प्राप्त होंगी। इसका तात्पर्य यह है कि हर गांव को आत्मनिर्भर बनना होगा और अपने मामलों की देखभाल स्वयं करनी होगी; यहां तक कि समूची दुनिया से अपनी रक्षा करने का भार भी स्वयं उसी के ऊपर होगा। उसे बाहरी आक्रमण से अपनी रक्षा करने के प्रयास में नष्ट हो जाने का प्रशिक्षण दिया जाएगा और उसके लिए उद्यत किया जाएगा।

इस प्रकार, अंतत: व्यक्ति ही इकाई माना जाएगा। इसका मतलब यह नहीं है कि वह पड़ोसियों या बाहरी दुनिया पर कतई निर्भर नहीं होगा या उनके द्वारा स्वेच्छा से की गई सहायता भी स्वीकार नहीं करेगा। लेकिन यह पारस्परिक व्यवहार उभय पक्षों की स्वतंत्रता और स्वेच्छा से संचालित होगा। इस प्रकार का समाज अनिवार्यतः मानव प्रकृति में परिवर्तन ज्यों ही मनुष्य स्वयं को समाज का सेवक मानने लगता है, समाज के लिए ही कमाता है और उसी के हितार्थ व्यय करता है, उसकी कमाई में शुद्धता का प्रवेश होने लगता है और उसका उपक्रम अहिंसा से युक्त हो जाता है | इसके अलावा, अगर लोगों के दिमाग इस जीवन पद्धति की ओर मुड़ने लगेंगे तो समाज में कटुता उत्पन्न हुए बगैर एक शांतिपूर्ण क्रांति हो जाएगी ।


यह पूछा जा सकता है कि क्या इतिहास में इसका उल्लेख है कि मानव प्रकृति में कभी इस तरह का परिवर्तन आया हो ? व्यक्तियों के जीवन में तो ऐसे परिवर्तन निश्चित रूप से हुए हैं। लेकिन समूचे समाज में ऐसा हुआ हो, इसके उदाहरण शायद न मिलें | लेकिन इसका कारण यही है कि अहिंसा को लेकर बड़े पैमाने पर अभी तक कभी प्रयोग नहीं किया गया है।


3.नैतिक आधार

शाकाहार के प्रति पूरी निष्ठा रखने के लिए आदमी को कुछ नैतिक आधार चाहिए.... कारण कि, यह आत्मा के निर्माण के लिए है, शरीर के नहीं। आदमी केवल मांस ही नहीं है। हमारा सरोकार उसके भीतर बैठी आत्मा से है । इसलिए, शाकाहारियों का नैतिक आधार यह होना चाहिए कि मनुष्य का जन्म मांसभक्षी पशु के रूप में नहीं हुआ है, अपितु पृथ्वी द्वारा उत्पन्न फलों और शाकों पर जीवन निर्वाह करने के लिए हुआ है। 

अहिंसा केवल आहारविज्ञान का मामला नहीं है, यह उससे परे की चीज़ है। आदमी क्या खाता-पीता है, इसका उतना महत्व नहीं है; महत्व उसके पीछे जो आत्मत्याग और आत्मसंयम है, उसका है। अपने भोजन की वस्तुओं चुनाव में जितना अधिक संयम बरतना चाहें, शौक से बरतिए । संयम प्रशंसनीय है, जरूरी भी, लेकिन यह के अहिंसा की सिर्फ कोर को ही छूता है। यह संभव है कि आहार के मामले में डटकर आज़ादी बरतने वाला व्यक्ति भी अहिंसा की मूर्ति हो, और यदि उसका हृदय प्रेम से आप्लावित है और दूसरों की पीड़ा को देखकर द्रवित हो उठता है तथा उसने वासनाओं से मुक्ति पा ली है, तो हम उसे जरूर आदर देंगे। दूसरी ओर, आहार में सदा अतिसावधानी बरतने वाला व्यक्ति यदि स्वार्थ और वासनाओं का दास है तथा हृदय का निर्मम है तो यह कहना पड़ेगा कि वह अहिंसा के पास भी नहीं फटका है और वह एक घृणित कमीना आदमी है |

यह भी स्मरण रखने योग्य है कि केवल जीवदया से ही हम काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और कपट, इन छह मारक शत्रुओं पर विजय पाने में सफल नहीं हो सकते.... जो व्यक्ति चींटियों और कीड़ों को रोज भोजन खिलाता है और जीवहत्या भी नहीं करता पर काम और क्रोध में आकंठ डूबा रहता है, उसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जिसकी प्रशंसा की जाए। उसकी जीवदया एक यांत्रिक कर्म है जिसका कोई आध्यात्मिक मूल्य नहीं है। बल्कि सच पूछा जाए तो यह यंत्रवत कर्म से भी गिरा हुआ काम है- यह अंदर के भ्रष्ट आचरण को छिपाने का एक पाखंडयुक्त आवरण है। 

4.समय पालन

मैंने मित्रों के बीच प्राय: यह राय जाहिर की है कि जहां तक अनासक्ति की क्षमता का प्रश्न है, अंग्रेज हमसे कहीं आगे हैं। कितने ही महत्व का राष्ट्रीय मसला हो, वे अपने भोजन और मनोरंजन के समय का पालन करते हैं | वे खतरा सामने देखकर या महासंकट की आशंका से घबराते नहीं हैं। इसे गीता की भाषा में अनासक्त भाव से काम करना कहा जा सकता है। भारत के राजनीतिक कार्यकर्ताओं में बहुत ही कम लोग हैं जिनकी इस मामले में अंग्रेजों के स्तर के साथ तुलना की जा सकती है.....

यदि नेतागण और कार्यकर्ता समय का पालन करें तो उससे राष्ट्र का निश्चित रूप से बड़ा लाभ होगा.... कोई व्यक्ति अपनी सामर्थ्य से अधिक काम नहीं कर सकता। यदि दिन की समाप्ति पर भी काफी काम बच रहता है या व्यक्ति अपने खाने, सोने अथवा मनोरंजन के समय में से कटौती किए बिना उसे समाप्त नहीं कर सकता तो समझना चाहिए कि व्यवस्था में कहीं कोई गड़बड़ है | मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि अगर हम समय-पालन की आदत डाल लें और निर्धारित कार्यक्रम के हिसाब से चलें तो राष्ट्र की कार्यकुशलता में वृद्धि होगी, अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की हमारी गति तीव्र होगी और कार्यकर्ताओं का स्वास्थ्य बेहतर बनेगा तथा उनके आयुष्य में वृद्धि होगी| 

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