भाषा माध्यम के रूप में तथा विषय के रूप में इस कथन की व्याख्या कीजिए।

 प्रश्न- : 'भाषा माध्यम के रूप में तथा विषय के रूप में इस कथन की व्याख्या कीजिए।



उत्तर-भाषा माध्यम के रूप में, बिहार पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2008 के अनुसार, "स्कूली शिक्षा के संदर्भ में भाषा पाटयचर्या का अ न महत्वपूर्ण भाग है। संवाद और संप्रेषण के अनिवार्य • प्राथमिक कार्यों के अतिरिक्त शिक्षण के सपूर्ण क्रियाकलापों में भाषा ही माध्यम बनती है तथा अवधारणाओं के निर्माण एवं ज्ञान के सृजन में बुनियादी भूमिका निभाती है। हम अपने विचारों और भावों को भाषा में न केवल अभिव्यक्त करते हैं बल्कि सोचने, महसूस करने और स्मृतियों में सहेजने का काम भी भाषा के द्वारा ही संभव हो पाता है। विचारपूर्वक देखें तो एक हद तक निजीऔर संपूर्ण रूप में सभी सामाजिक गतिविधियों का संचालन भाषा की ही सहायता से संभव हो पाता है.... यदि किसी भाषा का प्रयोग पूरी पाठ्यचर्या में होता है और इस कारण उसकी पढ़ाई सारे विषयों के साथ होती है, तब भी अनुदेश की भाषा के मुद्दे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा, 2005 के अनुसार, "भाषा शिक्षण केवल भाषा की कक्षा तक सीमित नहीं होता। विज्ञान, सामाजिक विज्ञान या गणित की कक्षाएँ भी एक तरह से भाषा की ही कक्षा होती है। किसी विषय को सीखने का मतलब है, उसकी अवधारणाओं को सीखना, उसकी शब्दावली को सीखना, उनके बारे में आलोचनात्मक ढंग से चर्चा करना और उनके बारे में लिख सकना। कुछ विषयों को लेकर विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया जाए कि वे अलग-अलग पुस्तकों का अध्ययन करें या उन भाषाओं में लोगों से बातचीत करें, इंटरनेट से अंग्रेजी में सामग्री एकत्रित करें। भाषा को लेकर पाठ्यचर्या में ऐसी नीति अपनाने से स्कूल में बहुभाषिकता को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, भाषा की शिक्षा कुछ अनूठे अवसर उपलब्ध कराती है।... यह दृष्टिकोण 'विषय के रूप में अंग्रेजी और माध्यम के रूप में अंग्रेजी की दूरी को पाट सकेगा। इस तरह से हम समान स्कूल पद्धति की दिशा में प्रगति कर सकते हैं, जिसमें भाषा शिक्षण और शिक्षण के माध्यम के रूप में भाषा के उपयोग में भेद ल हो।

इन दोनों उद्धरणों में मुख्य बात यह उभरकर आती है कि विभिन्न विषयों का अध्ययन करते समय भी हम एक प्रकार से भाषा ही सीख रहे होते हैं। हम जानते हैं कि विभिन्न विषयों की प्रकृति और अवधारणाएँ भिन्न होती हैं, अतः उन अवधारणाओं को संप्रेषित करने वाले शब्द या वे शब्द जो अवधारणाओं के साथ संयोजित होते हैं और जिन्हें प्रयुक्ति' कहते हैं-भिन्न होते हैं। उदाहरण के लिए, विज्ञान विषय में वायुमंडल, स्थलमंडल, जलमंडल, जलवाष्प, मृदा, प्रकाश संश्लेषण, पादप, बल, स्त्रीकेसर, पुंकेसर, परागकण, दहन, श्वसन, विकिरण, जीवाश्म ईंधन, अवशोषित, विलयन आदि शब्द एक विशिष्ट अवधारणा से संबद्ध हैं। इसी प्रकार गणित विषय में 'त्रिभुज, आयतन, लंब, समीकरण, दंड आरेख' आदि अवधारणाएँ एक विशिष्ट अर्थ में प्रयुक्त होती है। जब बच्चे इन विषयों को पढ़ते हैं तो ये सभी शब्द बच्चों के शब्द भंडार का हिस्सा भी बनते हैं और बच्चे यह समझ विकसित करते हैं कि शब्द भिन्न संदर्भों में भिन्न अर्थ संप्रेषित करते हैं। उदाहरण के लिए, गणित में प्रयुक्त होने वाला 'भिन्न' शब्द किसी एक वस्तु के कितने हिस्से हैं-की अवधारणा से जुड़ा है। (1/2 एक भिन्न संख्या है जिसका अर्थ है-एक वस्तु के दो हिस्से) जबकि हिन्दी भाषा में प्रयुक्त 'भिन्न' शब्द अलग, अंतर होने के भाव को दर्शाता है। (कक्षा के सभी बच्चे भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमि से आते हैं/श्यामा के रिबन का रंग सलमा के रिबन से भिन्न था।) इसी प्रकार 'मिट्टी, मृदा'/भूमि, जमीन, धरती का अर्थ एक ही है लेकिन वे शब्द अलग-अलग संदर्भों में अलग रूप में इस्तेमाल होते हैं।

इतना ही नहीं विषयों की अध्ययन सामग्री पढ़ते समय बच्चे अनायास रूप से विभिन्न प्रकार की वाक्य संरचनाओं से भी परिचित होते चलते हैं। अगर आप इतिहास विषय की पाठ्य पुस्तकों की भाषा पर गौर करे तो कह सकते हैं कि उनमें प्रयुक्त वाक्य संरचनाएँ प्रायः भूतकाल से संबद्ध होती हैं, जैसे-15 अगस्त, 1947 को हिन्दुस्तान आजाद हुआ था।देश को आजाद कराने में अनेक व्यक्तियों ने अपनी कुर्बानी दी थी। जब विषय के अध्ययन का माध्यम बच्चों की मातृभाषा या ऐसी भाषा जिसमें बच्चे चिन्तन करते हैं तो अवधारणाओं का बनना अपेक्षाकृत सरल हो जाता है, जैसे-बिहार की स्थानीय भाषाओं में गणित की 'त्रिभुज' और 'चतुर्भुज' की अवधारणाओं के लिए क्रमशः 'तिनकोनिया' और चौखूंटा' अधिक सहज एवं प्रचलित है। इसी तरह विज्ञान में 'पृथक्करण' (हवा के द्वारा) के लिए 'ओसाई' एवं 'स्त्रीकेसर', 'पुंकेसर' के लिए क्रमशः 'जायांग', 'पुमंग' अधिक सहज है।

स्पष्ट है कि बच्चों के सोचने-समझने का माध्यम भी भाषा ही होती है और अनुभवों के आधार पर वे ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में जो अवधारणाएँ बनाते हैं, उसमें भाषा की महती भूमिका होती है।

भाषा विषय के रूप में, एक विषय के रूप में प्राय: तीन भाषाओं के अध्ययन का प्रावधान हमारे विद्यालयों में है। ये भाषाएँ हो सकती हैं-मैथिली, भोजपुरी, हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, बांगला आदि। विद्यालयों में एक विषय के रूप में एक से अधिक भाषाएँ प्रायः प्रथम भाषा, द्वितीय भाषा और तृतीय भाषा के रूप में पढ़ाई जाती हैं। जिसका सीधा-सा अर्थ यह है कि बच्चों में इन भाषाओं के प्रयोग की कुशलता विकसित करना। विभिन्न स्थितियों में भाषा का प्रयोग करने की कुशलता या क्षमता उन्हें जीवन की अनेक आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करती है। वे अपने जीवन में भाषा का अनेक प्रकार से प्रयोग करते हैं, जैसे-अपनी इच्छा को प्रकट करना, किसी की राय लेना, अपना तर्क प्रस्तुत करना, किसी घटना के होने की संभावना को व्यक्त करना, संदेह करना, कल्पना करना, अतीत की घटनाओं को प्रस्तुत करना, किसी को समझाना आदि। भाषा की पाठ्य-पुस्तक में दिए गए पाठ बच्चों को यह अवसर देते हैं कि वे भाषा प्रयोग की कुशलता विकसित कर सके ।हिन्दी के पाठ्यपुस्तक में प्रस्तुत अभ्यासों के माध्यम से बच्चों को अपनी बात कहने का भरपूर अवसर दिया जाता है। ये अवसर दो तरीके से हैं पहला, पाठ विशेष के संदर्भ में, दूसरा उसी पाठ के विषय-वस्तु से संबंधित। ऐसे इसलिए कि बच्चे निजी अनुभवों को जोड़ते हुए बातचीत करने के विभिन्न संदर्भ प्रस्तुत कर सके। यह कोशिश की जाती है कि बच्चे पढ़े गए पाठ को अपने निजी अनुभवों के साथ जोड़कर देख सकें और अपने अनुभवों के आधार पर अपने भावों और विचारों को दूसरों के समक्ष आत्मविश्वास के साथ अभिव्यक्त कर सके। भाषा की कक्षा में संवाद के अवसर से बच्चों को भाषा-विशेष की विभिन्न छटाओं और बारीकियों से परिचित होने का अवसर भी मिलता है। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे उनकी भाषायी क्षमता में विकास होगा। एक विषय के रूप में भाषा शिक्षण का अर्थ है-भाषा के मौखिक और लिखित प्रयोग की कुशलता में वृद्धि करना।

भाषा शिक्षण के माध्यम से वे भाषा के विभिन्न पक्षों के साथ-साथ विषयगत अवधारणाओं को भी समझते हैं और माध्यम के रूप में बच्चे ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों की अवधारणाओं के साथ-साथ शब्दावली, संरचनाएँ समझते हैं और यही समझ विभिन्न क्षेत्रों में सही शब्दावली और भाषायी संरचनाओं के उचित और प्रभावी संप्रेक्षण में काम आती है।



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