प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा में बच्चों के विकास के विभिन्न आयामों की अन्तः निर्भरता एवं परिवार तथा शिक्षकों की भूमिका पर प्रकाश डालें ।

 प्रश्न 1 .प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा में बच्चों के विकास के विभिन्न आयामों की अन्तः निर्भरता एवं परिवार तथा शिक्षकों की भूमिका पर प्रकाश डालें । अथवा , विकास के विभिन्न आयामों की अंत : निर्भरता एवं परिवार तथा शिक्षकों की भूमिका ।



 उत्तर- बालक की विकास यात्रा माँ के गर्भ से ही प्रारंभ हो जाती है तथा फिर शिशुकाल , बाल्यकाल तथा किशोरावस्था से गुजरती हुई अपनी विकास की ऊँचाइयों को छूती हुई बालक को एक परिपक्व व्यक्ति ( mature Adult ) की संज्ञा दिलाने का प्रयत्न करती है । बालक का यह विकास उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों तथा आयामों में अलग - अलग रूप से होता है । इसी दृष्टि से हमने पहले के अध्यायों में शारीरिक विकास , गामक विकास , संज्ञानात्मकके अनुसार वृद्धि एवं विकास का है । विकास , भाषा विकास , संवेगात्मक विकास तथा सामाजिक विकास के रूप में इतना विस्तार से अलग - अलग रूप में ही अध्ययन किया है । परंतु ध्यान से अवलोकन किया जाए तो विकास के इस विभिन्न आयामों तथा पक्षों में अपनी - अपनी प्रकृति एक निश्चित स्वरूप और प्रतिमान होते हुए आपस में बहुत ज्यादा संबंध देखने को मिलता किसी एक आयाम अथवा पक्ष में होने वाले विकास का दूसरे सभी पक्षों से गहरा संबंध रहता है । एक - दूसरे को इनका यह आपसी पारस्परिक संबंध इतना अधिक प्रभावित करता है कि बहुधा एक पक्ष के विकास का सामान्य रूप से न होना दूसरे पक्ष के विकास में काफीचली जाती है , दूसरी ओर एक पक्ष में होने वाले समुचित विकास का अन्य पक्षों के विकास पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है और यही बात समन्वित होकर बालक के व्यक्तित्व को संपूर्ण रूप से एक सर्वांगीण तथा संतुलित रूप से विकसित व्यक्तित्व का रूप देने में सहायता करती है । आइए , देखें बालक के विकास के विभिन्न आयामों में किस प्रकार की अंत : निर्भरता पाई जाती है । A. शारीरिक विकास तथा अन्य आयामों के विकास की अंतःनिर्भरता ( Interdependecne of Physical Development & Other Aspects ) बालक के शारीरिक विकास तथा अन्य आयामों के विकास में पाई जाने वाली अंत : निर्भरता को निम्न प्रकार समझा जा सकता है : 1. जिस बालक का गामक विकास ( Motor Development ) समुचित ढंग स 1 रहा होता है उसमें गामक क्रियाओं के संपादन की क्षमता और योग्यताएँ अच्छी विकसित रहती हैं । चलना , घूमना फिरना , भागना , कूदना , फाँदना , चढ़ना इत्यादि हाथ की सभी क्रियाओं को वह बालक अपनी आयु के अनुसार करने में समर्थ बनता जाता है । इस प्रकार की क्रियाएँ उसके शारीरिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं । दूसरी ओर बालक का शारीरिक विकास भी उसके गामक विकास को अनुकूल एवं प्रतिकूल ढंग से प्रभावित करने की क्षमता रखता है । जो बालक शारीरिक रूप से स्वस्थ , सबल एवं नीरोग रहते हैं उनमें गामक क्रियाओं और गतिविधियों की मात्रा भी सामान्य व उचित ई जाती है । वे सभी प्रकार के गामक कौशलों ( Motor Skills ) के अर्जन में भी आगे पाए जाते हैं । इसके विपरीत जो बालक कमजोर , बीमार तथा शारीरिक विकास की दृष्टि से पिछड़े रहते हैं उनके गामक विकास का मार्ग भी अवरुद्ध सा रहता है । खड़े होने , चलने , भागने , दौड़ने , पकड़ने , संभालने , हाथ तथा पैर से कोई भी गति का कार्य करने की सभी क्षमताओं तथा योग्यताओं के विकास में वे प्रायः पिछड़े हुए ही दिखाई देते हैं । 2. मानसिक तथा संज्ञानात्मक विकास ( Mental Development ) का भी शारीरिक विकास से गहरा संबंध देखने को मिलता है । जो बालक मानसिक दृष्टि से आगे बढ़े हुए होते हैं , उनमें इतनी समझ विकसित हो जाती है कि वे इसका उपयोग शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने तथा शारीरिक दृष्टि से अच्छी तरह विकसित होने के प्रयत्नों में कर सके । मानसिक विकास से उन्हें अपने तथा अपने वातावरण के साथ समायोजित होने में भी शारीरिक विकास में बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकती है । दूसरी ओर जिन बालकों का मानसिक विकास सामान्य से कम होता है , वे शारीरिक विकास , शारीरिक शक्तियों और क्षमताओं के उचित एवं ही उपयोग तथा शारीरिक स्वास्थ्य के उचित संरक्षण आदि सभी क्षेत्रों में काफी पिछड़ जाते हैं ।अंत : निर्भरता के रूप में बालक का शारीरिक विकास भी उसके मानसिक विकास को अनेक दृष्टि से प्रभावित करता हुआ देखा जा सकता है । यह कहावत है कि " स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन तथा मस्तिष्क का निवास होता है बालक के शारीरिक विकास के उसके मानसिक विकास पर पड़ने वाले प्रभाव की ओर ही स्पष्ट रूप से संकेत करती है । होता भी ऐसा ही है , स्वस्थ शरीर एवं समुचित शारीरिक विकास के मालिक बालकों में ही एक स्वस्थ एवं सक्षम मानसिक संयंत्र कार्य कर रहा होता है । उनका स्नायु संस्थान , नाड़ी संस्थान तथा मस्तिष्क काफी विकसित , समन्वित एवं सजग पाया जाता है तथा उनकी मानसिक क्षमाएँ एवं योग्यताएँ भी इसी कारण अपेक्षाकृत अच्छे रूप में बढ़ी हुई पाई जाती है । 3. बालक के सामाजिक विकास तथा शारीरिक विकास में भी काफी गहरा संबंध देखने को मिलता है । जो बच्चे किन्हीं अन्य बालकों के साथ सामाजिक संबंध बनाने , उनके खलने - कूदने , मित्रता करने आदि बातों में पीछे रह जाते हैं तथा जो एकाकी तथा अलग - थलग जीवन जीने के आदी हो जाते हैं उनके शारीरिक विकास पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है , खेलकूद तथा अन्य सामाजिक गतिविधियों में भाग न लेने से उन्हें अपनी शारीरिक क्षमताओं तथा शक्तियों के विकास हेतु उपयुक्त अवसर नहीं प्राप्त होते मनोरंजन तथा अपनी शक्तियों के उचित प्रकाशन के अवसर भी उन्हें कम मिलते हैं और इस दृष्टि से उनके मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ता है और उनका शारीरिक विकास इसी अनुपात में प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता जाता है । दूसरी ओर बालकों का उचित सामाजिक विकास उन्हें शारीरिक रूप से विकसित होने के पर्याप्त अवसर तथा सुविधाएँ प्रदान करने की क्षमता रखता है । परिणामस्वरूप ऐसे बच्चे खेलकूद , मनोरंजन तथा सभी स्वास्थ्यवर्धक बातों में आगे बढ़े हुए दिखाई देते हैं । अतःनिर्भरता के दूसरे पक्ष में बालकों के शारीरिक विकास का उनकी सामाजिकता के विकास में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से गहरा योगदान रहता है शारीरिक रूप से विकसित स्वस्थ एवं सवल बालकों से सभी बालक मित्रता बनाना चाहते हैं । इन बालकों को खेलकूद , शारीरिक क्रियाओं , सामाजिक क्रियाओं तथा कार्य अनुभव क्रियाओं में काफी अच्छा योगदान रहता है । इस दृष्टि से इन्हें सामाजिक समायोजन तथा सामाजिक विकास के अवसर अन्य शारीरिक रूप से अविकसित बालकों की अपेक्षा सदैव ही अधिक मिलते हैं और अपने समूह में अच्छी सामाजिक प्रतिष्ठा तथा सम्मान प्राप्त होता रहता है । परिणामस्वरूप उनका सामाजिक विकास उनके शारीरिक विकास से सदैव ही अनुकूल ढंग से प्रभावित होता रहता है । 4. बालकों के शारीरिक विकास तथा संवेगात्मक विकास के पारस्परिक संबंधों को भी अच्छी तरह जाना और समझा जा सकता है । जहाँ बालकों का उचित शारीरिक विकास उनके उपयुक्त संवेगात्मक विकास में सहायक होता है जहाँ बालक के उपयुक्त संवेगात्मक विकास का उसके शारीरिक विकास पर भी उपयुक्त प्रभाव पड़ता है । व्यवहारिक जीवन में हम देखते हैं कि जो बालक शारीरिक रूप से स्वस्थ , सबल , सक्षम , तथा नीरोग रहते हैं और जिनका शारीरिक विकास उनकी अपनी आयु की दृष्टि से ठीक प्रकार चलता रहता है उनमें संवेगों का विकास तथा संवेगात्मक व्यवहार की अभिव्यक्ति भी उपयुक्त ढंग से होती है । दूसरी ओर जो बालक संवेगात्मक रूप से ठीक प्रकार आगे बढ़ रहे होते हैं उनके शारीरिक विकास को भी उनके इस प्रकार के विकास तथा व्यवहार से उपयुक्त आधार तथा अनुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त होती रहती हैं । जो बालक नकारात्मक संवेगों जैसे क्रोध , ईष्र्या ,घृणा , वैमनस्य , भय , चिंता आदि से जरूरत से ज्यादा प्रभावित नहीं होते तथा जिनमें सकारात्मक संवेगों तथा व्यवहार जैसे प्रेम , दया , हास - परिहास , विनोदप्रियता आदि की उचित मात्रा में उपर्युक्त अभिव्यक्ति देखने को मिलती है , वे शारीरिक विकास तथा अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्ति की दिशा में उपयुक्त ढंग से आगे बढ़ते हुए दिखाई देते हैं । इसके विपरीत जो बालक चिंतित रहते हैं , जिनमें आशंका तथा भय की मात्रा अधिक होती है , जो बात - बात पर क्रोधित होते रहते हैं या ईर्ष्या तथा वैमनस्य की आग में झुलसते रहते हैं उनके स्वास्थ्य तथा शारीरिक विकास पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ता है । 5. भाषा- विकास तथा शारीरिक विकास में भी काफी गहरा पारस्परिक संबंध देखने को मिल सकता है । आयु शारीरिक विकास की दिशा तथा मात्रा में ठीक अनुपात में रहने से बालक को अपनी के हिसाब से भाषा विकास का रास्ता तय करने में आसानी होती है । अतः बालक को अपने भाषा विकास में अच्छा स्वास्थ्य भी जरूरी होता है । वाक् तंत्र , गले , फेफड़े , स्नायु संस्थान आदि का उचित विकास बालक को उच्चारण संबंधी कुशलता प्राप्त करने में मदद करता है । उसकी सुनने की शक्ति का विकास उसे भाषा को ठीक प्रकार सुनकर सही अनुसरण करने की क्षमता प्रदान करता है । देखने , चलने , स्पर्श करने आदि इंद्रिय क्षमताओं का विकास , उसे ठीक प्रकार ज्ञान प्राप्त करके , उसे भाषा को सही रूप में अभिव्यक्त करने की क्षमता देता है । अपने शारीरिक सामर्थ्य के अनुसार ही कोई अच्छा और अधिक देरी तक संभाषण देने की क्षमता अर्जित करता है । लेखन संबंधी योग्यता भी बालक को शारीरिक क्षमता के विकास में मदद करता है । इस तरह भाषा संबंधी सभी प्रकार का विकास बालक के शारीरिक विकास से अनुकूल तथा प्रतिकूल ढंग से प्रभावित होता रहता है । दूसरी ओर बालक को अपने भाषा विकास से शारीरिक स्वास्थ्य अर्जित करने में मदद मिल सकती है । भाषा का उचित विकास उसे अपनी बात कहने तथा दूसरों की बात सुनने - समझने में पूरी मदद करता है । शारीरिक विकास तथा शारीरिक स्वास्थ्य जो भी बातें बालक को मौखिक या लिखित रूप से भाषा के माध्यम से समझाई जाती हैं वह उसे भाषा के उचित विकास के सहारे ही अच्छी तरह ग्रहण करने में समर्थ हो सकता है । भाषा विकास उसे दूसरे बालकों के साथ संबंध बनाने , खेल , कूद तथा अन्य शारीरिक क्रियाओं में ठीक प्रकार से भाग लेने में भी समर्थ बनाता है । इसके अभाव में वह अलग - थलग पड़कर उन क्रियाओं में सामूहिक रूप से भाग नहीं ले पाता जिनके माध्यम से उचित शारीरिक विकास की अधिक संभावनाएँ रहती हैं ।

Post a Comment

0 Comments