chapter 1
(प्रारंभिक बाल्यावस्था - देखभाल और शिक्षा)
प्रश्न 1. व्यक्तिगत अध्ययन पद्धति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-व्यक्तिगत अध्ययन पद्धति- व्यक्तिगत अध्ययन किसी भी व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक जीवन का संपूर्ण लेखा-जोखा होता है। यह किसी भी व्यक्ति के जीवन के कई महत्वपूर्ण तथ्यों को दर्शाता है। इस पद्धति का अधिकांश उपयोग बच्चे के मानसिक दोषों का विश्लेषण करने और उसे सुधारने के तरीके खोजने में होता है। इस पद्धति में बच्चे और उसके पर्यावरण से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य एकत्र किए जाते हैं। यह बच्चे के विकास और उसके पर्यावरण के बारे में विभिन्न पहलुओं को प्रकट करता है जो बच्चे के व्यवहार को समझने में मदद करता है।
प्रश्न 2. समावेशी शिक्षा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर- समावेशी शिक्षा का अर्थ समावेशी शिक्षा 'अलगाव' या 'अलगाव' के विपरीत है। समावेशी शिक्षा शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग बच्चों को सामान्य कक्षा में सामान्य बच्चों के साथ शिक्षा देने पर जोर देती है और विशेष बच्चों की विशेष जरूरतों को पूरा करने की स्वीकृति देती है। इस प्रकार संयुक्त शिक्षा में मुख्य धारा और एकीकरण का सहारा लेकर सभी बच्चों को एक साथ शिक्षित करने के उद्देश्य पर बल दिया जाता है। इस तरह विशेष और सामान्य बच्चों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता है।
इसका अंतिम लक्ष्य सभी शिक्षार्थियों, माता-पिता, समुदाय, शिक्षकों और नीति निर्माताओं को अपने सिस्टम में मतभेदों के बारे में सकारात्मक बनाना और इन मतभेदों को एक समस्या के बजाय एक चुनौती के रूप में लेना है।
प्रश्न 3. शिशु देखभाल के उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर – शिशु विहार पद्धति का उद्देश्य – फ्रोबेल के शब्दों में, शिशु विहार का उद्देश्य है “बच्चों को उनके स्वभाव के अनुसार काम देना, उनके शरीर को शक्ति देना, उनकी इंद्रियों को व्यवहार में लाना, उनके मन को जगाना और प्रकृति को देना और अन्य प्राणियों के साथ अपनी पहचान स्थापित करना। यह विधि, विशेष रूप से हृदय और उसके स्नेह को ऊपर उठाकर, उन्हें पूरी सृष्टि के मूल उद्गम की ओर ले जाती है, जहाँ सभी एक साथ हो जाते हैं।
प्रश्न 4. मोंटेसरी के प्राकृतिक विकास पर संक्षेप में टिप्पणी कीजिए।
उत्तर- प्राकृतिक विकास- 'यदि कोई शैक्षिक कार्य प्रभावी हो सकता है, तभी वह बालक के व्यक्तित्व के पूर्ण विकास में सहायक सिद्ध होता है। क्योंकि बच्चे का शरीर बढ़ता है, आत्मा विकसित होती है। ये दोनों शारीरिक और मानसिक रूप एक ही शाश्वत जीवन के दो रूप हैं।" उनका विचार था कि शिक्षा बच्चे का संपूर्ण व्यक्तिगत जीवन हैमें सहायता करे। उपयुक्त वातावरण जुटाया जाना चाहिए जिससे बच्चे अपनी सभी आंतरिक क्षमताओं में वृद्धि कर सकें। अध्यापक कभी पढ़ाता नहीं, वह बालक के निहित गुणों के विकास को सहज दिशा देता है।
प्रश्न 5. किंडरगार्टन (शिशु-विहार प्रणाली) के दोष बतावें
उत्तर-(i) फ्रोबेल ने बच्चों से बहुत अधिक आशा की है। बच्चे उपहारों द्वारा खेलते हुए एकता के अमूर्त भाव को नहीं समझ सक
(ii) किंडरगार्टन में बच्चों के आन्तरिक विकास पर बहुत अधिक बल दिया है। वातावरण के महत्व पर बहुत कम ध्यान दिया गया है।
(iii) उसके द्वारा उचित गीत असामयिक है। प्रत्येक स्कूल में इनका प्रयोग नहीं सकता ।
(iv) फ्रोबेल के उपहार साधारण है। वे ज्ञानेन्द्रियों के प्रशिक्षण में इतने सहायक नहीं है।
(v) यह पद्धति व्यक्तिगत अध्यापक की ओर ध्यान नहीं दे
(vi) विभिन्न विषयों के अध्यापन में समवाय की ओर बहुत कम ध्यान दिया गया है। (vii) यह भी संभव नहीं कि खेल-कूद को शिक्षा में इतना महत्व दिया जाए क्योंकि गंभीर अध्ययन के लिए यह उपयोगी नहीं है
प्रश्न 6. प्रारम्भिक बाल्यावस्था के देखभाल से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-पूर्व बाल्यकाल देखभाल एवं शिक्षा की समन्वयक पद्धति होने के कारण यह बच्चे के संपूर्ण विकास पर बल देती है। इसके मुख्य तत्व स्वास्थ्य देखभाल तथा पोषण के साथ-साथ खेल पद्धति खेल उपकरण एवं ऐसे अधिगम अनुभवों को बढ़ावा देती है जोकि बालक के शारीरिक, गत्यात्मक सामाजिक, संवेगात्मक तथा सौंदर्यानुभूति के विकास को बढ़ाती है। इसका संपूर्ण प्रयास बालक को एक प्राकृतिक आनंददायक एवं मनोरंजक पर्यावरण प्रदान करना है जो कि बच्चे के वृद्धि एवं विकास में सहायक होते हैं।
प्रश्न 7. शिशु विहार का क्या अर्थ है?
उत्तर-शिशु-विहार का अर्थ- फ्रोबेल ने बचपन के महत्व को महसूस किया 1839 में ब्लैकनबरन नामक स्थान पर 4 से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए प्रथम 'शिशु-विहार' शिक्षा केंद्र खोला। जर्मन में इसका नाम किंडरगार्टन है जिसका अर्थ है 'शिशुओं का बाग'। फ्रोबेल ने स्कूल को बाग की, शिक्षक को माली की तथा बच्चों को पौधों की संज्ञा दी। एक माली की भांति अध्यापक का कार्य है नन्हें पौधों की देख-भाल करना और उन्हें सुंदर तथा पूर्ण बनाने के लिए जल से सींचना फ्रोबेल ने बच्चों को फूलों की उपमा दी। उसका विश्वास था कि विकास और उन्नति के क्रम में बच्चे और फूल एक समान है। पौधे का विकास उसके भीतरी बीज के अनुसार होता है। उसी प्रकार बच्चे का विकास भी उसके भीतर से ही होता है वह अपनी प्रवृत्तियों और भावनाओं को अपने अंतर्मन से ही प्रस्फुटित करता है
प्रश्न 8. किंडरगार्टन (शिशु विहार प्रणाली) के गुणों की चर्चा करें।
उत्तर-किंडरगार्टन (शिशु-विहार प्रणाली) के
(i) इस संकल्पना ने स्कूल का एक अनिवार्य सामाजिक अभिकरण के रूप में महत्व बढ़ा दिया। फ्रोबेल ने शिक्षालय को छोटे समाज का रूप दिया जहाँ बच्चे जीवन के महत्वपूर्ण अंगों के लिए प्रशिक्षण प्राप्त करते हों। वे सहयोग, सहानुभूति, सहकारिता और उत्तरदायित्व
जैसे गुणों को सीखते है
(iv) बच्चों के स्वभाव, भावनाओं और प्रवृत्तियों के अध्ययन पर बल दिया गया। (v) शिशु-विहार के कार्यों और उपहारों ने एक नवीन अध्यापन पद्धति को जन्म दिया। (vi) शिशु-विहार में क्रियाशीलता के लिए पर्याप्त स्थान है।
(vii) विभिन्न उपहारों से ज्ञानेन्द्रियों का प्रशिक्षण होता है।
(viii) पाठ्चर्या प्रकृति अध्ययन होने के कारण बच्चों के मस्तिष्क में प्रकृति तथा विश्व के लिए प्यार की भावना जाग्रत होती है।
प्रश्न 9. शिक्षा आयोग १९६४-६६ के अनुसार पूर्व प्राथमिक शिक्षा के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर- शिक्षा आयोग, 1964-66 के विचार में पूर्व प्राथमिक शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित है (i) स्वस्थ आदतें डालना-बच्चे में अच्छी स्वस्थ आदतें डालना और व्यक्तिगत अनुकूलन के लिए जरूरी बुनियादी योग्यता पैदा करना जैसे-पोशाक, नहाने-धोने की आदतें, कंघी करना, दाँत साफ करना, हाथ धोकर खाना, सफाई इत्यादि।
(ii) वांछनीय सामाजिक अभिवृत्तियों का विकास-वांछनीय सामाजिक अभिवृत्तियाँ और शिष्टाचार विकसित करना तथा स्वस्थ सामूहिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना जिससे बच्चा दूसरों के अधिकारों और विशेषाधिकारों के प्रति सजग रह सकें।
(iii) अनुभूतियों और संवेगों के विकास के लिए मार्ग दर्शन-बच्चे की अपनी अनुभूतियों और संवेगों को अभिव्यक्त करने, समझने, मारने और नियंत्रित करने में मार्गदर्शन देकर संवेगों के मामले में क्षमता को विकसित करना। (iv) सौन्दर्य बोध-सौन्दर्य बोध को जगाना |
(v) आपस की दुनिया समझने में मदद करना-परिवेश के बारे में बौद्धिक जिज्ञासा की शुरुआत को प्रेरित करना और आसपास की उसकी दुनिया को समझने में उसकी मदद करना खोज पड़ताल तथा प्रयोग के अवसरों के जरिये नई अभिरुचियाँ पल्लवित करना। (vi) आत्म अभिव्यक्ति को प्रोत्साहन बच्चे को आत्मभिव्यक्ति के काफी अवसर
देकर स्वतंत्रता और सृजनशीलता के लिए प्रोत्साहित करना। (vii) भाषा का विकास बच्चे में अपने विचार और भावनाओं को धारावाहिक, शुद्धऔर स्पष्ट भाषा में व्यक्त करने की योग्यता को विकसित करना। (viii) शारीरिक विकास तथा निपुणता-बच्चे में अच्छा शरीर गठन करना, पर्याप्त मांसपेशी समन्वय एवं बुनियादी अंग चलाने में निपुणता विकसित करना।
प्रश्न 10. निरीक्षण विधि क्या है?
उत्तर-निरीक्षण विधि-निरीक्षण विधि व्यवहार के अध्ययन करने की एक सुविधाजनक और उपयुक्त विधि है। बच्चों का निरीक्षण कर उनके व्यवहार एवं व्यक्तित्व के गुणों के बारे में निष्कर्ष निकालना निरीक्षण विधि के कार्यक्षेत्र में आता है। उदाहरण के तौर पर अगर कोई बालक अपनी आँखें लाल करें, मुट्ठियाँ भींचे, दाँत किटकिटाए तब उसके इस व्यवहार का निरीक्षण कर हम यह कह सकते हैं कि वह क्रोधित अवस्था में है। इस प्रकार, अगर हम बालक को विभिन्न परिस्थितियों में तरह-तरह का व्यवहार करते देखें तो हम उसके इस प्रकार के व्यवहार का निरीक्षण कर उसकी मानसिक प्रक्रियाओं, व्यवहार और व्यक्ति सम्बन्धी विशेषताओं के बारे में बहुत कुछ जानकारी इकट्ठी कर सकते हैं यह जानकारी हमें बालकों के व्यवहार और व्यक्तित्व के बारे में उचित निष्कर्ष निकालने में काफी मदद कर सकती हैं और इस प्रकार बालकों के व्यवहार का अध्ययन करने में निरीक्षण विधि काफी उपयोगी और रचनात्मक सिद्ध हो सकती है।
निरीक्षण विधि द्वारा बालकों द्वारा किये जानेवाले सहज एवं स्वाभाविक व्यवहार क्रियाओं तथा चेष्टाओं का बड़े ही स्वाभाविक ढंग से जैसे वे सम्पन्न होती है।


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