प्रश्न 2. संगीत से आप क्या समझते हैं ? इसके उत्पत्ति एवं प्रकारों को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर – वर्तमान समय में शिक्षा का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है । शिक्षा का मुख्य उद्देश्य छात्रों का अधिकाधिक एवं सर्वांगीण विकास होता है । इसी कारण संगीत को भी विद्यालय एवं महाविद्यालय पाठ्यक्रम में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है । संगीत को सामान्यतः कई रूपों में देखा जाता है । जैसे - शास्त्रीय संगीत , लोक संगीत , सुगम संगीत , फिल्म संगीत आदि । वैसे संगीत की परिभाषा के अनुसार गायन , वादन एवं नृत्य तीनों शैलियों का सम्मिश्रण ही संगीत कहलाता है । अब प्रश्न यह सामने आता है कि संगीत की उत्पत्ति कैसे हुई । आइए ! संगीत की उत्पत्ति के बारे में ज्ञान प्राप्त करें । संगीत की उत्पत्ति – संगीत कला की उत्पत्ति कब और कैसे हुई , इस विषय पर सिद्धांतों के विभिन्न मत हैं , जिनमें से कुछ का उल्लेख इस प्रकार है ( i ) संगीत की उत्पत्ति आरम्भ में वेदों के निर्माता ब्रह्मा द्वारा हुई । ब्रह्मा ने यह कला शिव को दी और शिव के द्वारा सरस्वती को प्राप्त हुई । सरस्वती को इसीलिए वीण पुस्तक धारिणी कहकर संगीत और साहित्य की अधिष्ठात्री माना गया है । सरस्वती से संगीत कला का ज्ञान नारद को प्राप्त हुआ । नारद ने स्वर्ण के गंधर्व , किन्नर तथा अप्सराओं को संगीत शिक्षा दी । वहाँ से ही भरत , नारद और हनुमान आदि ऋषि संगीत - कला में पारंगत होकर भू - लोक ( पृथ्वी ) पर संगीत कला के प्राचारार्थ अवतीर्ण हुए । ( ii ) एक ग्रंथकार के मतानुसार , नारद ने अनेक वर्षों तक योग साधना की , तब शिव ने उन्हें प्रसन्न होकर संगीत कला प्रदान की । पार्वत की शयनमुद्रा को देखकर शिव ने उनके अंग - प्रत्यंगों के आधार पर रुद्रवीणा बनाई और अपने पाँच मुखों से पाँचव रागों की उत्पत्ति की । तत्पश्चात् छठा राग पार्वती के मुख द्वारा उत्पन्न हुआ । शिव के पूर्व , पश्चिम , उत्तर , दक्षिण और आकाशोन्मुख होने से क्रमशः भैरव , हिंडोल , मेघ , दीपक और श्री राग प्रकट हुए तथा पार्वती द्वारा कौशिक राग की उत्पत्ति हुई । शिवप्रदोष स्रोत में लिखा है कि त्रिजगत् की जननी गौरी को स्वर्ण सिंहासन पर बैठाकर प्रदोष के समय शूलपाणि शिव ने नृत्य करने की इच्छा प्रकट की । इस अवसर पर सब देवता उन्हें घेरकर खड़े हो गए और उनका स्तुत गान करने लगे । सरस्वती ने वीणा , इन्द्र तथा ब्रह्मा ने करताल बजाना आरंभ किया , लक्ष्मी गाने लगी और विष्णु भगवान मृदंग बजाने लगे । इस नृत्यमय संगीतोत्सव को देखने के लिए गंधर्व , यक्ष , पतग , उरग , सिद्ध साध्य , विद्याधर , देवता , अप्सराएँ आदि सब उपस्थित थे ।( iii ) संगीत दर्पण के लेखक दामोदर पण्डित ( सन् 1935 ई . ) के मतानुसार , संगीत को उत्पत्ति ब्रह्मा से ही हुई । अपने मत की पुष्टि करते हुए उन्होंने लिखा है द्रुहिणेत यदन्विष्टं प्रयुक्त भरतेन च । महादेवस्य पुरतस्तन्मार्गाख्य विमुक्तदम् ।। अर्थात् ब्रह्मा ( दुहिण ) ने जिस संगीत को शोधकर निकाला , भरत मुनि ने महादेव के सामने जिसका प्रयोग किया तथा जो मुक्तिदायक है , वह मार्गी संगीत कहलाता है । इस विवेचन से प्रथम मत का कुछ अंशों में समर्थन होता है । आगे चलकर इसी पंडित ने सात स्वरों की उत्पत्ति पशु - पक्षियों द्वारा इस प्रकार बताई है मोर से षड्ज , चातक से ऋषभ , बकरा से गांधार , कौआ से पंचम , मेढ़क से धैवत और हाथी से निषाद स्वर की उत्पत्ति हुई । **** ( iv ) फारसी के एक विद्वान का मत है हजरत मूसा जब घूमकर वहाँ की छटा देख रहे थे , उसी वक्त गैब से एक आवाज आई । कि या मूसा हकीकी , तू अपना असा ( एक प्रकार का डंडा , आ फकी से प्राप्त होता है । ) इस पत्थर पर मार । यह आवाज सुनकर हजरत मूसा ने अपना असा जोर से उस पर पत्थर मारा तो पत्थर के सात टुकड़े हो गए और हर एक टुकड़े में से पानी की धारा अलग - अलग बहने लगी । उसी जलधारा की आवाज से अस्सामलेक हजरत मूसा ने सात स्वरों की रचना की , जिन्हें ' सा रे ग म प ध नि कहते हैं । **** ( v ) एक अन्य फारसी विद्वान का कथन है कि पहाड़ों पर मूसीकार नाम का एक पक्षी होता है , जिसकी चोंच में बाँसुरी की भाँति सात सूराख होते हैं । उन्हीं सात सूराखों से सात स्वर ईजाद हुए । ( vi ) पाश्चात्य विद्वान फ्रायड के मतानुसार , संगीत की उत्पत्ति एक शिशु के समान , मनोविज्ञान के आधार पर हुई । जिस प्रकार बालक रोना , चिल्लाना , हँसना आदि क्रियाएँ आवश्यकतानुसार स्वयं सीख जाता है , उसी प्रकार मानव में संगीत का प्रादुर्भाव मनोविज्ञान के आधार पर स्वयं हुआ । ( vii ) जेम्स लौंग के मतानुयायियों का भी यही कहना है कि पहले मनुष्य ने बोलना सीखा , चलना - फिरना सीखा और फिर शनैः शनैः क्रियाशील हो जाने पर उसके अन्दर संगीत स्वतः उत्पन्न हुआ । इस प्रकार सांगीत की उत्पत्ति के विषय में विभिन्न मत पाए जाते हैं । इनमें कौन सा मत ठीक है , यह कहना कठिन है । प्राचीन ग्रंथों में संगीत के चार मुख्य पाए जाते हैं 1. शिव मत या सोमेश्वर मत , 2. कृष्ण मत या कल्लिनाथ मत , 3. भरत मत और 4. हनुमन्मत । संगीत के इतिहास काल का विभाजन भारतीय संगीत के इतिहास को निम्नांकित चार भागों में विभक्त किया जा सकता है 1. अति प्राचीन काल ( वैदिक काल ) 2000 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व तक 2. प्राचीन काल ( वैदिक सांस्कृतिक परम्परा समाप्त हो जाने के बाद ) 1000 ईसा पूर्व से सन् 800 ई . तक । 3. मध्य काल ( मुस्लिम काल ) 800 ई . से 1800 ई . तक 4. आधुनिक काल 1200 ई . से वर्तमान काल तक|


0 Comments
thank you visiting 🙏🏾🤝❤️